जबड़े के कैंसर की सर्जरी के बाद जबड़ा दोबारा कैसे बनता है, मुंबई के डॉक्टर ने समझाया
एसएसओ कैंसर हॉस्पिटल, मुंबई के डॉ. अमित चक्रवर्ती के मुताबिक कैंसर निकालने के साथ जबड़े की पुनर्रचना भी सर्जरी का अहम हिस्सा है, ताकि मरीज फिर खा, बोल और निगल सके।
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जबड़े के कैंसर में गांठ निकालकर मरीज की जान बचाना सबसे जरूरी होता है। लेकिन सर्जरी में निकाला गया जबड़े का हिस्सा दोबारा बनाना भी उतना ही जरूरी है। इससे मरीज को फिर से खाना चबाने, बोलने और चेहरे का आकार पहले जैसा करने में मदद मिलती है। इस बारे में एसएसओ कैंसर हॉस्पिटल, मुंबई के हेड एंड नेक कैंसर सर्जन डॉ. अमित चक्रवर्ती ने जानकारी दी है।
डॉ. चक्रवर्ती के मुताबिक मुंह या जबड़े का कैंसर बढ़ी हुई स्टेज में हो, तो गांठ के साथ जबड़े की हड्डी का कुछ हिस्सा भी निकालना पड़ सकता है। कैंसर को पूरी तरह निकालने के लिए यह जरूरी होता है। मगर इससे चेहरे की बनावट में बड़ा बदलाव आ सकता है। उनका कहना है कि आधुनिक सर्जरी की वजह से अब निकाले गए हिस्से को दोबारा बनाना मुमकिन हो गया है, और इससे मरीज रोजमर्रा के काम फिर कर पाता है।
पुनर्रचना क्यों करनी पड़ती है, इस पर डॉक्टर ने बताया कि जब गांठ जबड़े की हड्डी तक पहुंच जाए, तो हड्डी का प्रभावित हिस्सा निकालना पड़ सकता है। तब मरीज को खाना चबाने, निगलने और बोलने में दिक्कत आ सकती है, और चेहरे का आकार भी बदल सकता है। उनके अनुसार पुनर्रचना सिर्फ चेहरा पहले जैसा करने के लिए नहीं है। खाने, बोलने और निगलने जैसे जरूरी कामों के लिए जबड़ा चाहिए। इसलिए इस सर्जरी का मुख्य मकसद यह है कि मरीज जितना हो सके, सामान्य जिंदगी जी सके।
जबड़ा दोबारा कैसे बनाया जाता है, इसके बारे में डॉ. चक्रवर्ती ने बताया कि नीचे के जबड़े का बड़ा हिस्सा निकालना पड़े, तो डॉक्टर फ्री फ्लैप रिकंस्ट्रक्शन नाम की सर्जरी का तरीका अपना सकते हैं। इसमें मरीज के शरीर के किसी दूसरे हिस्से से, जैसे पैर से, हड्डी का कुछ भाग लिया जाता है। उसके साथ वहां की रक्तवाहिनियां भी ली जाती हैं। जरूरत हो तो त्वचा या मांसपेशियों का कुछ हिस्सा भी लिया जा सकता है।
इसके बाद मरीज के जबड़े के आकार के हिसाब से इस हड्डी को सही शक्ल दी जाती है। सूक्ष्म सर्जरी की मदद से इस हड्डी की रक्तवाहिनियों को गर्दन की रक्तवाहिनियों से जोड़ा जाता है। इससे नई लगाई गई हड्डी को खून की सप्लाई मिलती है और निकाला गया हिस्सा दोबारा बनने में मदद होती है।
मरीज कितनी जल्दी ठीक होगा, यह डॉ. चक्रवर्ती के मुताबिक कई बातों पर निर्भर करता है: कैंसर कितना बढ़ा है, कितना हिस्सा निकालना पड़ा, मरीज की सेहत कैसी है और रेडिएशन जैसे आगे के इलाज की जरूरत है या नहीं। कुछ मरीजों को दांत दोबारा लगाने का इलाज, फिजियोथेरेपी और बोलने तथा निगलने की प्रैक्टिस के लिए खास इलाज की जरूरत पड़ सकती है।
डॉक्टर के अनुसार कैंसर की सर्जरी करते समय ही यह योजना बनाना जरूरी है कि जबड़ा कैसे दोबारा बनाना है। सर्जरी के बाद मरीज खा सके, बोल सके और दांत लगवा सके, इसका ख्याल डॉक्टरों को पहले से रखना पड़ता है। उसी के हिसाब से तय होता है कि कितना हिस्सा निकालना है और जबड़ा कैसे बनाना है।
डॉ. चक्रवर्ती का कहना है कि हेड और नेक सर्जरी की आधुनिक तकनीक से जबड़े के कैंसर का इलाज करा रहे मरीजों को बड़ी राहत मिल रही है। कैंसर को पूरी तरह निकालना डॉक्टरों का पहला लक्ष्य होता है। साथ ही जबड़े की पुनर्रचना से मरीज को फिर खाने, बोलने और आत्मविश्वास से रोजमर्रा की जिंदगी जीने में मदद मिलती है, और इससे उसके जीवन की गुणवत्ता सुधरती है।