पितृपक्ष के बाद ही क्यों शुरू होता है नवरात्र, 11 अक्टूबर को घटस्थापना से आगाज
हिंदू पंचांग की तिथियों के क्रम में पितृपक्ष के ठीक बाद शारदीय नवरात्र आता है। इस साल घटस्थापना 11 अक्टूबर को है और विजयादशमी 20 अक्टूबर को।
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पितृपक्ष खत्म होते ही नवरात्र शुरू हो जाता है। दोनों का सिलसिला इस तरह लगातार क्यों बैठता है, इसका मुख्य कारण हिंदू पंचांग की तिथियों का क्रम बताया गया है। पितृपक्ष पूर्वजों को याद करने, श्राद्ध और तर्पण करने का समय माना जाता है। उसके बाद आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रोत्सव शुरू होता है।
साल 2026 में पितृपक्ष 10 अक्टूबर को खत्म हो रहा है। अगले ही दिन, यानी रविवार 11 अक्टूबर को घटस्थापना के साथ शारदीय नवरात्र की शुरुआत होगी। इसी वजह से पितृपक्ष के फौरन बाद नवरात्र आने के पीछे की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को समझना अहम हो जाता है।
हिंदू धर्म के हर पर्व-त्योहार के पीछे सिर्फ धार्मिक विधि नहीं होती, बल्कि जिंदगी को देखने का एक बड़ा नजरिया भी होता है। भाद्रपद पूर्णिमा के बाद शुरू होने वाला पितृपक्ष पूर्वजों को याद करने, उनके ऋण को महसूस करने और कृतज्ञता जताने का वक्त माना जाता है। पितरों को तर्पण, श्राद्ध और श्रद्धांजलि देने के साथ पितृपक्ष पूरा होता है।
हिंदू संस्कृति में इंसान जन्म से ही कई ऋणों से बंधा माना जाता है, जिनमें पितृऋण को खास अहमियत दी गई है। जिन पूर्वजों से जीवन, संस्कार, परंपरा, परिवार और संस्कृति मिली, उन्हें याद करना नैतिक जिम्मेदारी समझा जाता है। पितृपक्ष में ज्ञात और अज्ञात, दोनों तरह के पूर्वजों के नाम पर श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और अन्नदान जैसे विधि किए जाते हैं।
इस दौरान भौतिक सुख से ज्यादा स्मरण, संयम, श्रद्धा और कृतज्ञता पर जोर रहता है। इसलिए पितृपक्ष को सिर्फ दुख या शोक का समय नहीं कहा गया। यह वह वक्त है जो यह एहसास कराता है कि "हम कहां से आए हैं"।
पितृपक्ष के बाद आश्विन शुक्ल प्रतिपदा आती है, जिसे शारदीय नवरात्र की शुरुआत की तिथि माना जाता है। एक तरफ पितृपक्ष में पूर्वजों को याद किया जाता है, तो दूसरी तरफ नवरात्र में आदिशक्ति का आवाहन करके नई ऊर्जा को अपनाया जाता है। पूर्वजों के आशीर्वाद की भावना मन में रखकर आगे के जीवन के लिए शक्ति और सकारात्मकता मांगने की यह परंपरा है।
नवरात्र आदिशक्ति की उपासना का पर्व है। इन दिनों देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। दुर्गा, महालक्ष्मी, महासरस्वती और काली जैसे शक्तिरूपों में स्त्रीशक्ति और दैवी सामर्थ्य के दर्शन माने जाते हैं। नौ दिन की उपासना में उपवास, जप, ध्यान, देवी की आराधना, सप्तशती पठन, भजन-कीर्तन और कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। महाराष्ट्र में कई जगह घटस्थापना करके देवी के सामने अखंड नंदादीप जलाया जाता है। घटस्थापना को नवरात्र की शुरुआत भर नहीं, बल्कि घर और मन में दैवी शक्ति के स्वागत का प्रतीक कहा गया है।
शारदीय नवरात्र का समय बारिश का मौसम खत्म होकर शरद ऋतु शुरू होने का होता है। कुदरत में भी इस वक्त बदलाव महसूस होता है। इसलिए भारतीय परंपरा में यह दौर शरीर, मन और माहौल की शुद्धि के लिए साधना, उपवास और सात्त्विक आहार से जोड़ा गया है। नवरात्र के उपवास और संयम का रिश्ता सिर्फ धार्मिक श्रद्धा से नहीं, बल्कि खानपान की अनुशासन और आत्मसंयम से भी जोड़ा जाता है। उत्सव के जरिए मन को खुश रखना और शरीर व मन को नए मौसम के लिए तैयार करना, इसके पीछे का व्यापक नजरिया बताया गया है।
पितृपक्ष में पीछे मुड़कर देखा जाता है। पूर्वजों को याद किया जाता है, उनके दिए संस्कारों की याद की जाती है और उनके जीवन से मिले मूल्यों को आगे ले जाने का संकल्प लिया जाता है। नवरात्रोत्सव में शक्ति, विजय, ज्ञान और सद्गुणों की उपासना होती है। इसीलिए पितृपक्ष के बाद नवरात्र का आना सिर्फ कैलेंडर की तिथियों का क्रम नहीं है। इसे भारतीय संस्कृति की जीवनदृष्टि के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है।
तारीखें इस प्रकार हैं। घटस्थापना रविवार 11 अक्टूबर 2026 को है। महानवमी 19 अक्टूबर 2026 को है। विजयादशमी मंगलवार 20 अक्टूबर 2026 को है।
नवरात्र का हर दिन देवी की आराधना, जप-ध्यान और सात्त्विक आचरण में बिताने की परंपरा है। नवमी के दिन नवरात्र का समापन होता है और उसके बाद विजयादशमी, यानी दशहरा मनाया जाता है।