गोवा के शिरगांव में लइराई देवी का मंदिर, जत्रा में जलते अंगारों पर चलते हैं भक्त
शिरगांव (डिचोली) के लइराई देवी मंदिर के वैशाख मेले में हज़ारों श्रद्धालु जुटते हैं और अग्निदिव्य की परंपरा निभाई जाती है।
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गोवा का नाम आते ही समुद्रकिनारे, कुदरती नज़ारे और घूमने की जगहें याद आती हैं। लेकिन वहां की सांस्कृतिक ज़िंदगी में देवी-देवताओं की उपासना और लोकपरंपराओं की भी उतनी ही अहमियत है। डिचोली (Bicholim) के शिरगांव में स्थित श्री लइराई देवी मंदिर ऐसी ही पुरानी आस्था और खास लोकपरंपरा का जाना-माना केंद्र है।
लइराई देवी को आदिशक्ति का रूप माना जाता है, खासकर माता पार्वती के स्वरूप में। हर साल वैशाख महीने में यहां शिरगांव मेला लगता है, और उसमें होने वाला अग्निदिव्य मंदिर को अलग पहचान देता है। यह मंदिर गोवा के अहम धार्मिक श्रद्धास्थानों में गिना जाता है।
स्थानीय धार्मिक परंपरा के मुताबिक लइराई देवी को जागृत देवी माना जाता है और गोवा के कई भक्त उन्हें मानते हैं। देवी की उपासना में भक्ति, मन्नत, कृतज्ञता और संकटों से रक्षा की आस दिखती है। शिरगांव और आसपास के इलाके के श्रद्धालुओं के लिए वे सिर्फ मंदिर की देवी नहीं हैं, बल्कि कुलपरंपरा और गांव की आस्था का बड़ा सहारा हैं।
शिरगांव मेले की वजह से ही मंदिर की सबसे ज़्यादा ख्याति हुई है। यह मेला आम तौर पर मई महीने में, वैशाख शुद्ध पंचमी के आसपास लगता है। तब गोवा के साथ महाराष्ट्र और दूसरे इलाकों से भी हज़ारों श्रद्धालु शिरगांव पहुंचते हैं। मंदिर परिसर भक्तों से भर जाता है। पारंपरिक वाद्यों की आवाज़, देवी के जयघोष और अलग-अलग धार्मिक विधियों से पूरे इलाके में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है।
मेले का सबसे अनोखा आकर्षण अग्निदिव्य है, जिसे स्थानीय परंपरा में होमकुंड से जुड़ी विधि माना जाता है। बड़ी मात्रा में लकड़ियां जलाकर धधकते अंगारे तैयार किए जाते हैं और भक्त उन पर नंगे पैर चलते हैं। पहली बार देखने वाले को यह बेहद चौंकाने वाला लग सकता है। लेकिन शामिल भक्तों के लिए यह देवी पर आस्था, मन्नत और भक्तिभाव का हिस्सा है। उनका विश्वास है कि देवी की कृपा से वे यह अग्निदिव्य पार कर पाते हैं। इस विधि में शारीरिक हिम्मत के साथ मन के पक्के भरोसे और भक्ति को खास अहमियत दी जाती है।
मेले का एक और अहम हिस्सा देवी के भक्त हैं, जिन्हें 'धोंड' कहा जाता है। मेले के दौरान ये भक्त कुछ खास धार्मिक नियम और परंपराएं निभाते हैं। देवी की सेवा, उपासना और मेले की धार्मिक विधियों में उनकी अहम भूमिका होती है। मेले के दिन धोंड भक्तों की भागीदारी और उनके ज़रिए होने वाली धार्मिक विधि लइराई देवी की परंपरा की खासियत मानी जाती है।
लइराई देवी का मेला सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं है। उसमें लोककला, संगीत, पारंपरिक पहनावा, सामूहिक भागीदारी और आस्था का मेल दिखता है। गोवा के लोकजीवन की पुरानी परंपराएं इस उत्सव के ज़रिए आज भी ज़िंदा हैं, और आज के दौर में भी हज़ारों लोग इसमें शामिल होते हैं। इसी वजह से यह मेला गोवा की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है।
समुद्रकिनारों से आगे गोवा की धार्मिक और लोकपरंपरा से रूबरू कराने वाली यह एक खास जगह है। शिरगांव का मेला देखने आने वाले श्रद्धालुओं को यहां देवीभक्ति, लोकपरंपरा और सामूहिक आस्था का अनोखा नज़ारा मिलता है।
आज के दौर में कई लोकपरंपराएं धीरे-धीरे बदल रही हैं। ऐसे में लइराई देवी के मेले और उससे जुड़ी धार्मिक परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभालकर रखना ज़रूरी बताया गया है। साथ ही ऐसी विधियों में शामिल होते वक्त स्थानीय मंदिर प्रशासन की हिदायतें, सुरक्षा इंतज़ाम और मेडिकल एहतियात मानना बेहद ज़रूरी है। शिरगांव की ज़मीन पर देवी लइराई के नाम का जयघोष गूंजता है, हज़ारों भक्त जुटते हैं और अग्नि को साक्षी मानकर अपनी आस्था ज़ाहिर करते हैं।