मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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19:12 IST

सप्तशृंगी देवी को क्यों कहते हैं अर्धशक्तिपीठ, अठारह भुजाओं वाली मूर्ति की मान्यता

नवरात्र से पहले सप्तशृंगी शक्तिपीठ की मान्यताएं, मूर्ति, मंदिर तक का रास्ता और गोद भरने की परंपरा।

सप्तशृंगी देवी को क्यों कहते हैं अर्धशक्तिपीठ, अठारह भुजाओं वाली मूर्ति की मान्यता
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

देश भर में नवरात्रि की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस साल शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर, रविवार से शुरू हो रहा है। इन दिनों देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है और भक्त शक्तिपीठों में जाकर दर्शन भी करते हैं। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक और महाराष्ट्र के 'साढ़े तीन शक्तिपीठों' में गिना जाने वाला सप्तशृंगी शक्तिपीठ भी उन जगहों में है, जहां बड़ी तादाद में भक्त पहुंचते हैं।

सप्तशृंगी को अर्धशक्तिपीठ कहा जाता है। महाराष्ट्र में साढ़े तीन शक्तिपीठों की जो परंपरा चली आ रही है, उसमें तीन पीठ पूरे माने जाते हैं और सप्तशृंगी को आधे पीठ का दर्जा मिला है। तुलजापुर की तुलजाभवानी, कोल्हापुर की महालक्ष्मी और माहूर की रेणुका माता पूर्ण शक्तिपीठ मानी जाती हैं। सप्तशृंगी देवी यहां कुमारिका यानी बालिका रूप में विराजमान हैं, इसलिए इसे अर्धपीठ कहा जाता है।

यहां माता सती का दायां हाथ गिरने की मान्यता है। यह कथा शिवपुराण और देवीपुराण की उसी मशहूर कथा से जुड़ी है, जिसमें माता सती के यज्ञकुंड में प्राण देने के बाद भगवान शिव के विलाप और उनके शरीर के अंगों के अलग-अलग जगह बिखरने का जिक्र है।

कथा के मुताबिक राजा दक्ष ने एक यज्ञ रखा था, लेकिन भगवान शिव और माता सती को न्योता नहीं दिया। बिना बुलाए माता सती वहां चली गईं। तब दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया। माता सती यह अपमान सह नहीं पाईं और यज्ञ की अग्नि में कूदकर उन्होंने प्राण त्याग दिए।

माता सती की मृत्यु से क्रोधित भगवान शिव उनका पार्थिव शरीर कंधे पर उठाकर पूरे ब्रह्मांड में प्रलयंकारी तांडव करने लगे। दुनिया को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग अलग करने शुरू किए। मान्यता है कि उसी वक्त माता सती का दायां हाथ महाराष्ट्र में नाशिक के पास वणी इलाके के सात पर्वतों, यानी सप्तशृंग, की चोटी पर गिरा। इसी वजह से यह जगह 51 शक्तिपीठों और महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में खास स्थान रखती है।

भागवत पुराण के अनुसार महिषासुर का वध करते वक्त देवी दुर्गा के रूप में बेहद क्रोधित थीं। अपने उस रौद्र रूप को शांत करने और आराम करने के लिए वे सह्याद्रि की इन सात चोटियों पर आकर रहने लगीं। यहां भक्तों को उनके पूरे रौद्र रूप का सिर्फ सौम्य और आधा अंश दिखता है।

यह भी माना जाता है कि ऋषि मार्कंडेय ने इसी जगह देवी महात्म्य की रचना की। देवी की मूर्ति की गर्दन एक तरफ थोड़ी झुकी हुई है। आख्यायिका है कि सामने के पहाड़ पर बैठकर ऋषि मार्कंडेय जब 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कर रहे थे, तब उनकी स्तुति के शब्द ध्यान से सुनने के लिए देवी उसी दिशा में थोड़ी झुक गईं।

ऋषि मार्कंडेय के रचे 'मार्कंडेय पुराण' (देवी महात्म्य) के मुताबिक सप्तशृंगी देवी की यह मूर्ति साक्षात महालक्ष्मी का स्वरूप है। अठारह भुजाओं वाली इस देवी को 'अष्टादशभुजा' कहा जाता है, हालांकि कुछ संदर्भों में उन्हें आठ भुजाओं वाली अष्टभुजा के रूप में भी बताया गया है। मूर्ति करीब 8 फुट (2.4 मीटर) ऊंची है और पूरी तरह सिंदूर से ढकी होने की वजह से गहरे सिंदूरी (केसरिया) रंग की दिखती है।

माना जाता है कि देवी के हाथों में अलग-अलग देवताओं के दिए हथियार और चीजें हैं। इनमें भगवान शिव का त्रिशूल, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, वरुण का शंख, अग्निदेव की ज्वालाएं, वायुदेव का धनुष-बाण, वज्र, इंद्र की घंटा, यम का दंड, दक्ष की अक्षमाला (मणियों की माला), ब्रह्मदेव का कमंडलु (जलपात्र), सूर्यदेव की किरणों का प्रतीक, काली की तलवार और ढाल, विश्वकर्मा का परशु (कुल्हाड़ी), कुबेर का मद्य का प्याला और गदा शामिल हैं।

सप्तशृंगी देवी नाशिक से करीब 65 किलोमीटर दूर, 4800 फुट ऊंचे सप्तशृंग पर्वत पर विराजमान हैं। मंदिर के एक तरफ गहरी खाई है और दूसरी तरफ ऊंचा पहाड़। भक्त करीब 472 सीढ़ियां चढ़कर मुख्य मंदिर तक पहुंचते हैं। गुफा में तीन द्वारों, शक्ति द्वार, सूर्य द्वार और चंद्र द्वार, से देवी के दर्शन किए जाते हैं।

नवरात्र के दौरान देवी का गोंधल और गोद भरने की परंपरा निभाई जाती है। माता सप्तशृंगी की गोद भरने के लिए भक्त नारियल, चुनरी, साड़ी, चूड़ियां, सिंदूर, फूल और मिठाई लेकर आते हैं। श्रद्धा है कि यहां माता अपने भक्तों को 18 हाथों से आशीर्वाद देती हैं। यहां भक्तों को पूरनपोली का प्रसाद दिया जाता है।

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