फ्रांस में महंगाई, कम तनख्वाह और शिक्षा बजट में कटौती पर सड़कों पर उतरे 6 लाख से ज्यादा लोग
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पेरिस, ल्योन और मार्सेल समेत पूरे फ्रांस में रैलियां निकलीं। छात्र, कर्मचारी और रिटायर्ड लोग शामिल हुए, ज्यादातर प्रदर्शन शांत रहे।
पेरिस: फ्रांस में बढ़ती महंगाई, कम तनख्वाह और शिक्षा के बजट में कटौती को लेकर लोगों का गुस्सा सड़कों पर आ गया। पूरे देश में 6 लाख से ज्यादा लोग प्रदर्शन में उतरे। पेरिस से लेकर ल्योन और मार्सेल तक बड़ी रैलियां निकाली गईं। इनमें छात्र, कर्मचारी और रिटायर्ड लोग शामिल हुए।
कुछ शहरों में झड़पें हुईं, लेकिन ज्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे। इस आंदोलन की शुरुआत सितंबर में एक हाई स्कूल में स्टाफ की कमी के खिलाफ हुए विरोध से हुई थी। पहले छात्र शिक्षा के लिए ज्यादा बजट की मांग कर रहे थे। धीरे-धीरे कर्मचारी भी जुड़ते गए। महंगाई बढ़ने के बीच वे तनख्वाह और पेंशन में बढ़ोतरी मांग रहे हैं।
फ्रांस की मजदूर यूनियनों का कहना है कि ईंधन, खाने-पीने की चीजों, किराए, गैस और बिजली के दाम बढ़ रहे हैं, पर लोगों की कमाई उसी रफ्तार से नहीं बढ़ रही। इस विरोध का असर स्कूलों पर भी पड़ा। देश के करीब एक तिहाई हाई स्कूल या तो बंद रहे या उनका कामकाज सामान्य ढंग से नहीं चल सका।
कुछ स्कूलों में छात्रों ने सड़कें रोक दीं, जबकि कई दूसरे इलाकों में शिक्षकों ने हड़ताल की। कुछ जगहों पर सार्वजनिक परिवहन पर भी असर पड़ा। पेरिस का मशहूर एफिल टॉवर गुरुवार को बंद रखा गया था। पेरिस के प्रदर्शन में छात्र ऐसे पोस्टर लिए खड़े दिखे, जिन पर असमानता और भविष्य को लेकर चिंता लिखी थी। कर्मचारियों ने बेहतर वेतन और रिटायरमेंट के बाद की पेंशन की मांग रखी।
70 हजार पुलिस तैनात: आंदोलन को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। पूरे देश में 70,000 पुलिसकर्मी लगाए गए। उनकी मदद के लिए बख्तरबंद गाड़ियां, ड्रोन और हेलिकॉप्टर भी तैनात थे। फिर भी प्रदर्शन हमेशा शांत नहीं रहे। रेन शहर में कुछ नकाबपोश लोगों ने सड़कें रोकने की कोशिश की। अधिकारियों ने बताया कि पुलिस पर स्टील के गोले भी फेंके गए।
सरकार पर बढ़ता दबाव: फ्रांस की मजदूर यूनियनों ने चेतावनी दी है कि देश मंदी की तरफ बढ़ रहा है और कंपनियों में कर्मचारियों की छंटनी की योजनाएं बढ़ रही हैं। यूनियनों का कहना है कि सरकार लोगों की रोजमर्रा की दिक्कतें दूर करने में नाकाम रही है। इसी वजह से यह आंदोलन अब सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं रहा। इसमें समाज के कई तबके शामिल हो गए हैं।
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