पाकिस्तान पर विदेशी कर्ज 135.1 अरब डॉलर हुआ, चीन सबसे बड़ा कर्जदार देश
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विश्व बैंक की इंटरनेशनल डेट रिपोर्ट 2026 के मुताबिक पाकिस्तान का विदेशी कर्ज 135.1 अरब डॉलर पर पहुंच गया है।
पाकिस्तान की आर्थिक मुश्किलों में एक और चिंता की बात सामने आई है। विश्व बैंक की इंटरनेशनल डेट रिपोर्ट 2026 के मुताबिक पाकिस्तान का विदेशी कर्ज बढ़कर 135.1 अरब डॉलर हो गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दस साल में इस कर्ज में करीब दोगुनी बढ़ोतरी हुई है।
रिपोर्ट के आंकड़ों के हिसाब से पाकिस्तान का विदेशी कर्ज 2015 में 68.637 अरब डॉलर था। 2025 के आखिर तक यह 135.107 अरब डॉलर पर पहुंच गया, यानी दस साल में 96.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2024 में यह आंकड़ा 129.92 अरब डॉलर था।
इस पूरे कर्ज में तीन हिस्से हैं। सार्वजनिक और सरकारी गारंटी वाला कर्ज 107.076 अरब डॉलर है। निजी क्षेत्र का कर्ज 17.58 अरब डॉलर है, जबकि कम मियाद का कर्ज 10.45 अरब डॉलर है। रिपोर्ट से देश की अर्थव्यवस्था पर विदेशी कर्ज के भारी बोझ की तस्वीर साफ दिखती है।
कर्ज देने वालों में सबसे आगे चीन है। रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान पर चीन का बकाया कर्ज 22.4 अरब डॉलर है। उसके बाद विश्व बैंक का 19.2 अरब डॉलर और एशियाई विकास बैंक का 16.83 अरब डॉलर का कर्ज आता है। बढ़ता कर्ज, ब्याज का बढ़ता बोझ और चुकाने की जिम्मेदारी, इन सबसे पाकिस्तान के सामने चुनौतियां और गंभीर हो गई हैं।
सार्वजनिक और सरकारी गारंटी वाले कर्ज को देखें तो इसमें से 56.83 अरब डॉलर बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं से लिए गए हैं। 42.43 अरब डॉलर अलग-अलग देशों से और 7.8 अरब डॉलर निजी कर्जदाताओं से लिए गए हैं। चीन ने 2025 में पाकिस्तान के दो अरब डॉलर के कर्ज की मियाद बढ़ाई थी, जिससे फौरन चुकाने का कुछ दबाव कम हुआ है।
कर्ज जुटाने की लागत भी चिंता का विषय है। 2025 में सरकारी या अधिकृत कर्जदाताओं से लिए गए नए कर्ज पर औसत ब्याज दर 3.6 प्रतिशत थी। निजी कर्जदाताओं से लिए गए नए कर्ज पर यह दर 8.6 प्रतिशत रही। अधिकृत कर्ज की औसत मियाद 16 साल थी और चार साल की रियायत अवधि मिली थी। निजी कर्ज की औसत मियाद सिर्फ तीन साल थी और रियायत अवधि महज एक साल की थी।
एक राहत की बात यह है कि राष्ट्रीय आय के मुकाबले विदेशी कर्ज का अनुपात 2024 के 35.8 प्रतिशत से घटकर 2025 में 33.9 प्रतिशत पर आ गया। फिर भी कर्ज का कुल आंकड़ा बढ़ रहा है, इसलिए आगे आर्थिक संभालने की चुनौती बनी हुई है। पाकिस्तान खुद को इससे उबार पाता है या और गहरे आर्थिक गड्ढे में जाता है, यह आने वाले वक्त में पता चलेगा।
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