सोम‌वार, 2 नवंबर 2026

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पांच सौ करोड़ की कथित ऑडियो क्लिप पर बहस तेज, SIT जांच पर टिकी सबकी नजर

पांच सौ करोड़ की कथित ऑडियो क्लिप पर बहस तेज, SIT जांच पर टिकी सबकी नजर तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
PT24 टीम

एक कथित ऑडियो क्लिप ने एकनाथ शिंदे और मनोज जरांगे का नाम पैसों की सियासत में जोड़ दिया है। मुख्यमंत्री फडणवीस ने SIT जांच शुरू होने की बात कही है।

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के इर्द-गिर्द अचानक एक नया तूफान उठ खड़ा हुआ है। इस तूफान के बीच में पांच सौ करोड़ रुपये का सवाल है। शिंदे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) की एक अहम पार्टी के नेता हैं। उन्होंने ठाकरे परिवार और मातोश्री से अलग होकर अपनी पार्टी खड़ी की। शिवसेना का नाम और धनुष-बाण का चुनाव चिन्ह, जो बालासाहेब की बनाई पार्टी का था, आज उन्हीं के पास है। लोकसभा में उनकी पार्टी के तेरह सांसद हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की आगे की सियासी बिसात में शिंदे एक अहम मोहरा माने जाते हैं।

अब सवाल उठ रहे हैं कि इतना पैसा आया कहां से, किसने किसके लिए दिया और क्या यह मनोज जरांगे को देने के लिए था। जरांगे तो शिंदे के चाहने वालों में गिने जाते थे और शिंदे ने आंदोलन में उनकी काफी मदद की थी, फिर वे अचानक शिंदे के खिलाफ क्यों दिख रहे हैं। यह भी पूछा जा रहा है कि पांच सौ करोड़ रुपये एक साथ कोई कैसे संभाल या ले जा सकता है। बैंकों की सिक्योरिटी वैन भी एक बार में चार-पांच करोड़ से ज्यादा नहीं ले जाती। ऐसे में सौ-दो सौ गाड़ियां लेकर कोई महाराष्ट्र में घूमता तो क्या पकड़ा नहीं जाता।

पैसे और चुनाव का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है। पिछले पच्चीस साल में उम्मीदवारों और पार्टियों का खर्च बहुत बढ़ गया है। पहले कार्यकर्ता वड़ा-पाव खाकर दिन भर उम्मीदवार के लिए दौड़ता था, अब ऐसा नहीं होता। गाड़ी, पेट्रोल, खाना-पीना और बाकी इंतजाम का बोझ उम्मीदवार के सिर आता है। इसलिए टिकट मांगने वाले कार्यकर्ता से पार्टी के नेता सीधे पूछते हैं कि चुनाव में कितना खर्च करोगे। कुछ पार्टियां तो चिन्ह देने से पहले इलेक्शन फंड में उम्मीदवार के हिस्से का हिसाब भी लगाती हैं।

मुंबई इलाके की एक जानी-मानी विपक्षी पार्टी के जीते हुए विधायक ने पांच साल पहले बताया था कि उस चुनाव में उन्हें दस करोड़ से ज्यादा खर्च करना पड़ा। एक-एक सीट पर ऐसे चार-पांच दमदार उम्मीदवार हो सकते हैं और राज्य में करीब 200 सीटों पर ऐसी कड़ी टक्कर होती है। चुनाव आयोग पार्टियों और उम्मीदवारों के खर्च के रिकॉर्ड जांचता है, पर उन रिकॉर्ड में न दिखने वाला खर्च अलग से होता रहता है। "वोट का दो हजार रेट निकाला, घर-घर तीन-तीन हजार पहुंचाए", ऐसी बातें चुनाव के वक्त कार्यकर्ताओं से आम सुनने को मिलती हैं। बड़ी सोसायटियों में भी थोक में वोट की बोली लगती है, जैसे सोसायटी की कंपाउंड दीवार बनवा दो या नगर निगम का टैक्स भर दो।

अब आरोप शिंदे पर हैं। एक कथित ऑडियो क्लिप से जरांगे और शिंदे का नाम पैसों की सियासत में साथ जुड़ गया है। क्लिप से ऐसा लगता है कि बीजेपी के कुछ नेता चर्चा कर रहे हैं कि जरांगे पाटिल को देने के लिए सांसद श्रीकांत शिंदे के पास 2024 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के दौरान पैसा पहुंचाया गया था। क्लिप असली है या किसी ने काट-जोड़कर बनाई है, उसमें AI का हाथ है या बातचीत सच है, और सच है तो पैसा देने-लेने वाले सामने आएंगे या नहीं, ये सारे सवाल अब जांच का हिस्सा हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की है कि विशेष जांच दल (SIT) यह जांच शुरू कर चुका है।

जिस दौर का यह मामला बताया जाता है, उसे याद कीजिए। तब फडणवीस महायुति सरकार में उपमुख्यमंत्री थे, दूसरे उपमुख्यमंत्री अजितदादा पवार थे और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे। शिंदे करीब ढाई साल मुख्यमंत्री रहे। उनसे पहले उद्धव ठाकरे को भी लगभग इतना ही वक्त मिला था। ठाकरे नवंबर 2019 में मुख्यमंत्री बने और जून 2022 के आखिर में उनकी कुर्सी चली गई। शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के आसपास ही जालना के अंतरवाली सराटी गांव के मराठा नेता मनोज जरांगे पाटिल सक्रिय हुए।

उनकी मांग थी कि सारे मराठों को कुणबी जाति में शामिल किया जाए, यानी उन्हें OBC मानकर आरक्षण का लाभ मिले। इसके लिए उन्होंने दर्जन भर उपवास किए और मुंबई तक मोर्चे निकाले। शिंदे ने इसका कामयाबी से सामना किया और शिंदे से मुलाकात के बाद जरांगे ने उपवास छोड़ दिए और मोर्चे समेट लिए।

2024 के विधानसभा चुनाव से पांच-छह महीने पहले शिंदे की महायुति सरकार तनाव में थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव में महायुति को सिर्फ 17 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस, शरद पवार और ठाकरे की महाविकास आघाड़ी (मविआ) ने 31 सीटें जीतीं। नवंबर 2024 में तस्वीर बदल गई। महायुति को 235 सीटें मिलीं और मविआ के सिर्फ 49 विधायक बचे। इस फर्क के कई कारण होंगे और एक कारण यह भी होगा कि जरांगे पाटिल की कथित मराठा राजनीतिक पार्टी नहीं बनी।

सितंबर-अक्टूबर 2024 में जरांगे ने आंदोलन का जो दबदबा बनाया था, उससे उन्हें खुद राजनीतिक नेतृत्व के सपने आने लगे थे। अगस्त 2024 से ही अंतरवाली सराटी में चुनाव लड़ने के इच्छुक मराठा नेताओं की भीड़ जुटने लगी थी। सात-आठ सौ उम्मीदवारों के इंटरव्यू हुए, उम्मीदवारी बांटी गई, पर ऐन वक्त पर जरांगे बोले, "हम इस झमेले में नहीं पड़ते।" जिस दिन पैसे पहुंचाने का दावा किया जा रहा है, उस दिन जरांगे ने 24 घंटे में 800 इंटरव्यू लेने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। पार्टी बनेगी या नहीं, नाम और चिन्ह क्या होगा, निर्दलीय लड़ना है या नहीं, इनमें से किसी सवाल का साफ जवाब उन्होंने न तब दिया, न बाद में। नामांकन भरे गए और वापसी के मोड़ पर अंतरवाली से राजनीतिक इरादे छोड़ने का ऐलान हो गया। जरांगे ने तब वजह दी थी कि जीत का गणित नहीं बैठ रहा।

इसके बाद जनता में यह भावना फैली कि जरांगे ने दगा दिया और वहीं से बड़े पैसों के लेन-देन की चर्चा शुरू हुई। परदे के पीछे क्या हुआ, यह किसी को समझ नहीं आया। अब इस कथित टेप के बाहर आने से महायुति के भीतर भी शक का माहौल बन गया है और सवाल है कि इससे राजनीतिक फायदा किसका हुआ। फिलहाल तो जवाब यही बनता है कि सबसे बड़ा नुकसान महायुति का ही हुआ है।

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