शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

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ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की याचिका खारिज की, पगार नहीं पद देखा जाएगा

ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की याचिका खारिज की, पगार नहीं पद देखा जाएगा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 टीम

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ओबीसी क्रीमी लेयर तय करते समय पालकों की पगार की आमदनी नहीं जोड़ी जाएगी। केंद्र सरकार की दुरुस्ती याचिका खारिज हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी क्रीमी लेयर के मामले में केंद्र सरकार की दुरुस्ती याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने साफ किया है कि ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर तय करते वक्त पालकों की पगार से होने वाली आमदनी को नहीं गिना जाएगा।

कोर्ट के मुताबिक किसी को क्रीमी लेयर से बाहर रखा जाए या नहीं, यह पालकों की आमदनी पर नहीं, बल्कि उनकी सेवा में स्थिति और पद पर निर्भर करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा है कि यह फैसला पूर्वलक्षी प्रभाव से लागू नहीं होगा।

इससे पहले 11 मार्च को "यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन" केस में सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर के मापदंडों पर एक अहम स्पष्टीकरण दिया था। ताजा याचिका उसी फैसले को लेकर थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि क्रीमी लेयर का निर्धारण सिर्फ आमदनी के आधार पर नहीं, बल्कि स्थिति के आधार पर होता है। इसलिए पालकों का पद, यानी वे ग्रुप ए, बी, सी या डी में से किसमें आते हैं, देखना जरूरी है। आम तौर पर माना जाता है कि जिस उम्मीदवार की सालाना आमदनी 8 लाख रुपये से ज्यादा है, वह क्रीमी लेयर में आता है। लेकिन मूल नियमों यानी 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम के हिसाब से पगार और खेती की जमीन से मिलने वाली आमदनी 8 लाख रुपये की गिनती से बाहर रखी गई है।

केंद्र सरकार की याचिका में मुख्य मांग यह थी कि कोर्ट 11 मार्च का फैसला पूर्वलक्षी की जगह भविष्यलक्षी प्रभाव से लागू करने का आदेश दे। सरकार ने दलील दी कि अगर वह फैसला पीछे की तारीख से लागू हुआ, तो 2012 से हुई नियुक्तियों, सेवा आवंटन और सीनियरिटी लिस्ट में सुधार करना पड़ेगा। सरकार ने आईएएस, आईपीएस और आईएफएस कैडर आवंटन का उदाहरण भी दिया। सरकार का कहना था कि इसका असर ऐसे कर्मचारियों पर भी पड़ेगा जो इस केस में पक्षकार ही नहीं हैं, और प्रशासकीय व्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाएगी।

केंद्र ने कोर्ट से यह भी गुजारिश की थी कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs), बैंकों और निजी क्षेत्र के पदों की सरकारी पदों से तुलना के लिए एक नई, एकसमान नीति बनाने को उसे दो साल का वक्त दिया जाए। कोर्ट ने यह अर्जी भी खारिज कर दी।

ओबीसी यानी इतर पिछड़ा वर्ग को सभी सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलता है। इस वर्ग के कुछ उम्मीदवारों को "क्रीमी लेयर" माना जाता है, यानी वे जो आर्थिक और सामाजिक तौर पर सक्षम हैं और जिन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं। इसके लिए 8 लाख रुपये सालाना आमदनी की सीमा तय की गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक निजी क्षेत्र या PSUs में काम करने वाले पालकों की आमदनी को क्रीमी लेयर का आधार नहीं माना जा सकता।

अब केंद्र सरकार और DoPT को ऐसे उम्मीदवारों के मामले में आगे की कार्रवाई करनी होगी, जो 11 मार्च के फैसले के हिसाब से ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर के लिए पात्र थे और सिविल सेवा परीक्षा पास करने के बावजूद जिन्हें नियुक्ति या सेवा आवंटन नहीं मिला था। कोर्ट ने ऐसे पात्र उम्मीदवारों को नियुक्त करने के निर्देश दिए हैं। कहा जा रहा है कि इसका असर सिर्फ मौजूदा मामलों तक सीमित नहीं रहेगा, आगे भी ओबीसी क्रीमी लेयर तय करने के लिए 1993 के नियमों के मुताबिक मापदंड लागू होंगे।

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