नवरात्रि में दक्षिण भारत के घरों में सजती हैं गुड़ियाएं, जानिए बोम्मई गोलू की परंपरा
तमिलनाडु में खास तौर पर मशहूर बोम्मई गोलू नवरात्रि के नौ दिनों में घरों में गुड़ियों और मूर्तियों की सजावट की परंपरा है।
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भारत में हर राज्य की भाषा, पहनावा, खानपान, त्योहार और धार्मिक परंपराएं अलग-अलग हैं, लेकिन उनके पीछे की श्रद्धा और भक्ति अक्सर एक जैसी होती है। नवरात्रोत्सव इसकी अच्छी मिसाल है। महाराष्ट्र में घटस्थापना, देवी का जागर, गोंधल और भोंडला की परंपराएं दिखती हैं। गुजरात में गरबा और दांडिया का उत्साह रहता है, जबकि पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा बड़े पैमाने पर मनाई जाती है।
इसी तरह दक्षिण भारत में नवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला बोम्मई गोलू (Bommai Golu) गुड़ियों की अपनी खास सजावट की वजह से सबका ध्यान खींचता है। तमिलनाडु में यह परंपरा खास तौर पर लोकप्रिय है। घर-घर में यह भक्ति, कला, रचनात्मकता और सामाजिक मेलजोल को साथ जोड़ती है।
नाम का मतलब समझ लें तो उत्सव का रूप साफ हो जाता है। तमिल भाषा में बोम्मई यानी गुड़िया या प्रतिकृति, और गोलू यानी क्रम से की गई सजावट। यानी तरह-तरह की गुड़ियाओं और मूर्तियों को एक तय तरीके से सजाना ही बोम्मई गोलू है।
यह उत्सव मुख्य रूप से शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में मनाया जाता है। तमिलनाडु के अलावा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के कई परिवारों में भी इस परंपरा के अलग-अलग रूप दिखते हैं। कुछ जगहों पर इसे कोलू, गोलू या बोम्मला कोलुवु भी कहा जाता है।
घर की किसी साफ जगह पर लकड़ी या धातु की सीढ़ीनुमा रचना खड़ी की जाती है। उस पर साफ कपड़ा बिछाकर अलग-अलग तरह की गुड़िया और मूर्तियां रखी जाती हैं। इस सजावट में धार्मिक श्रद्धा के साथ कलात्मक सुंदरता और कल्पनाशीलता को भी अहमियत दी जाती है। हर घर का गोलू अलग हो सकता है। कुछ घरों में पीढ़ियों से संभालकर रखी पुरानी मूर्तियां होती हैं, तो कुछ घरों में हर साल नई गुड़ियाएं जुड़ती हैं।
नवरात्रि आदिशक्ति की उपासना का उत्सव है। इन दिनों देवी दुर्गा, महालक्ष्मी और महासरस्वती की भक्ति भाव से पूजा होती है। बोम्मई गोलू की परंपरा में भी देवी की उपासना केंद्र में रहती है। लोक परंपरा के मुताबिक गोलू की सीढ़ियों पर देवी-देवता, ऋषि-मुनि, पौराणिक पात्र, जानवर, पक्षी और इंसानी जिंदगी के दृश्य सजाए जाते हैं। कुछ प्रचलित धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि में दैवी शक्ति का खास महत्व होता है, इसलिए घर में मूर्तियां रखकर पूजा करना शुभ माना जाता है। इस परंपरा की शुरुआत और उसके धार्मिक अर्थ को लेकर अलग-अलग इलाकों में अलग कथाएं चलती हैं।
गोलू की सबसे अहम खासियत उसकी सीढ़ियां हैं। आम तौर पर तीन, पांच, सात, नौ या ग्यारह जैसी विषम संख्या में सीढ़ियां बनाई जाती हैं। हालांकि घर की जगह, उपलब्ध मूर्तियों और परिवार की परंपरा के हिसाब से संख्या बदल सकती है। सीढ़ियों पर सफेद या रंगीन कपड़ा बिछता है और मूर्तियां विषय और ऊंचाई के हिसाब से रखी जाती हैं। कुछ घरों में सीढ़ियां लकड़ी की बनती हैं, तो कहीं तैयार धातु या दूसरे सामान के ढांचे इस्तेमाल होते हैं। हर स्तर को एक खास रूप देने की कोशिश होती है, जिससे पूरी सजावट एक सुंदर कलाकृति जैसी लगती है।
हर सीढ़ी पर क्या रखा जाए, यह परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है। कुछ घरों में धार्मिक और पौराणिक विषयों को तरजीह मिलती है, तो कुछ में सामाजिक जीवन के दृश्यों को। मूर्तियों में देवी दुर्गा, महालक्ष्मी, महासरस्वती, गणपति, भगवान विष्णु, भगवान शिव, श्रीराम, श्रीकृष्ण और दूसरे देवी-देवता होते हैं। कुछ परिवारों में कुलदेवता की मूर्ति को खास जगह दी जाती है। रामायण में श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण से जुड़े प्रसंग और महाभारत में श्रीकृष्ण, अर्जुन व दूसरे अहम पात्रों के दृश्य भी बनाए जाते हैं। इससे बच्चों को महाकाव्यों की कथाएं समझाने का मौका मिलता है। कुछ सजावटों में संत, ऋषि-मुनि, धार्मिक गुरु और भक्तों की मूर्तियां या चित्र भी होते हैं।
गांव की जिंदगी और पारंपरिक पेशे भी इसमें दिखते हैं। किसान, कुम्हार, बुनकर, दुकानदार, दूधवाला और सब्जी बेचने वाले की गुड़ियाएं रखी जाती हैं। कहीं बाजार, गांव का मेला या पारंपरिक शादी का दृश्य बनाया जाता है। गाय, हाथी, घोड़ा, हिरण, मोर और तरह-तरह के पक्षियों की प्रतिकृतियों से प्रकृति की विविधता दिखाई जाती है, साथ ही बाग, खेत, तालाब और गांव के माहौल के छोटे दृश्य भी बनते हैं। आज कई परिवार विज्ञान, पर्यावरण संरक्षण, सफाई, शिक्षा, अंतरिक्ष शोध और सामाजिक जागरूकता जैसे विषयों पर भी गोलू सजाते हैं।
बोम्मई गोलू में मरपाची बोम्मई नाम की लकड़ी की गुड़ियाओं का खास महत्व है। ये पारंपरिक तरीके से लकड़ी से बनती हैं और कई जगह पति-पत्नी की जोड़ी के रूप में होती हैं। इन्हें रंगा जाता है या पारंपरिक कपड़े पहनाकर सजाया जाता है। कुछ परिवारों में शादी के वक्त नवविवाहित जोड़े को मरपाची गुड़ियाओं की जोड़ी देने की परंपरा है। बाद में ये गुड़ियाएं नवरात्रि के गोलू में रखी जाती हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलने वाली पारिवारिक विरासत की निशानी बन जाती हैं।
नवरात्रि से पहले ही कई घरों में गोलू की तैयारी शुरू हो जाती है। घर की कोई साफ और खुली जगह चुनी जाती है, फिर सीढ़ियां खड़ी करके उन पर कपड़ा बिछाया जाता है। मूर्तियां रखते वक्त उनका आकार, विषय और दृश्य का आपसी तालमेल देखा जाता है। देवी-देवताओं की मूर्तियों के लिए खास जगह रखी जाती है। उसके बाद पौराणिक प्रसंग, सामाजिक जीवन, प्रकृति और दूसरे विषयों के दृश्य सजाए जाते हैं।
सजावट पूरी होने पर देवी की पूजा होती है। नौ दिनों तक घर के सदस्य नियम से पूजा-अर्चना करते हैं। कुछ परिवारों में भजन, स्तोत्र पाठ और देवी के गीत गाने की परंपरा है। कई परिवारों में दसवें दिन, यानी विजयादशमी को गोलू का समापन किया जाता है।
देवी-देवताओं की मूर्तियों से लेकर रोजमर्रा की जिंदगी के दृश्यों तक, हर सजावट अपनी अलग कहानी कहती है। पुरानी गुड़ियाओं में पूर्वजों की यादें बसी होती हैं, तो नई सजावट में अगली पीढ़ी की कल्पनाशीलता झलकती है। नवरात्रि सिर्फ देवी की उपासना का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की कला परंपराओं और लोकजीवन का भी उत्सव है, और बोम्मई गोलू उसकी एक सुंदर मिसाल है। ऐसी परंपराओं को संभालना सिर्फ बीते दौर के रिवाज निभाना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत की कला, ज्ञान, श्रद्धा और सामूहिक जीवनमूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।