डोंबिवली नवरात्रोत्सव में 'श्रीदेवी महिषासुरमर्दिनी' नाट्य की प्रस्तुति, दर्शक मंत्रमुग्ध
डोंबिवली के शारदीय नवरात्रोत्सव में बंगळुरू के दक्षिण भारतीय कलाकारों ने 'श्रीदेवी महिषासुरमर्दिनी' नाट्य पेश किया।
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डोंबिवली के शारदीय नवरात्रोत्सव में 'श्रीदेवी महिषासुरमर्दिनी' नाट्य की प्रस्तुति हुई। इसमें आदिशक्ति की महिमा और संस्कृति की समृद्ध पौराणिक परंपरा दिखाई गई। इस नाट्य ने उत्सव में भक्तिरस का अलग ही अनुभव दिया।
यह प्रस्तुति बेंगलुरु से आए दक्षिण भारतीय कलाकारों ने दी। उन्होंने पारंपरिक कलाशैली में पूरा नाट्य पेश किया। नृत्य, नाट्य, अभिनय और भक्तिभाव के सुंदर मेल से वहां मौजूद दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए।
इस प्रस्तुति में भारतीय संस्कृति की वैभवशाली परंपरा का दर्शन हुआ। सांसद डॉ. श्रीकांत एकनाथ शिंदे ने कहा कि ऐसे कला आयोजनों से संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण होता है, और इन्हें प्रोत्साहन देना वक्त की जरूरत है।
नाट्य में दिखाया गया कि महिषासुर के अत्याचार से सृष्टि की रक्षा के लिए आदिशक्ति दुर्गा ने महिषासुरमर्दिनी का रूप धारण किया। उनकी अनोखी ताकत और विजय की गाथा असरदार ढंग से सामने रखी गई। पारंपरिक वेशभूषा, नृत्य की लयबद्धता, अभिनय की सहजता और भक्ति से भरे माहौल ने प्रस्तुति को खास ऊंचाई दी। कलाकारों ने पौराणिक कथा के सामर्थ्य, शौर्य और विजय के संदेश को कला के जरिए पेश किया और दर्शकों को भारतीय परंपरा के सांस्कृतिक मूल्यों का एहसास कराया।
यह नवरात्रोत्सव सांसद डॉ. श्रीकांत एकनाथ शिंदे के मार्गदर्शन में आयोजित हुआ है। इसमें नवकुंडात्मक सहस्रचंडी महायाग, हरिपाठ, भजन, भक्तिसंगीत और कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का जागरण किया जा रहा है। श्रद्धा, भक्ति और संस्कृति के इस संगम में दक्षिण भारतीय कलाकारों के श्रीदेवी महिषासुरमर्दिनी नाट्य ने सांस्कृतिक वैभव में और इजाफा किया। कार्यक्रम से यह संदेश भी रेखांकित हुआ कि भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत को संभालने वाली कलाओं को प्रोत्साहन दिया जाए और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
आज के आधुनिक और तकनीक वाले दौर में मनोरंजन के कई माध्यम मौजूद हैं, फिर भी पारंपरिक कलाओं ने अपनी अलग जगह बनाए रखी है। इन कलाओं में सिर्फ मनोरंजन की ताकत नहीं है। पीढ़ी दर पीढ़ी संभाली गई सांस्कृतिक विरासत, श्रद्धा और जीवनमूल्य अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सामर्थ्य भी इनमें है। इसलिए ऐसी पारंपरिक कलाओं को मंच मिलना, कलाकारों को प्रोत्साहन मिलना और कलापरंपराओं का संवर्धन होना बहुत अहम है। इस नाट्य से नई पीढ़ी को भारतीय पौराणिक परंपरा की पहचान होती है और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व की भावना भी मजबूत होती है।