शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

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नाशिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभमेले की शुरुआत आज, राष्ट्रपति मुर्मू के हाथों ध्वजारोहण

नाशिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभमेले की शुरुआत आज, राष्ट्रपति मुर्मू के हाथों ध्वजारोहण तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

नाशिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभमेला 31 अक्टूबर 2026 से 24 जुलाई 2028 तक चलेगा। रामकुंड और कुशावर्त तीर्थ पर दोपहर 12:02 बजे ध्वजारोहण होगा।

नाशिक और त्र्यंबकेश्वर में आज से सिंहस्थ कुंभमेले की शुरुआत हो रही है। यह मेला 31 अक्टूबर 2026 को शुरू होकर 24 जुलाई 2028 तक चलेगा। शुभारंभ ध्वजारोहण से होगा। नाशिक के रामकुंड और त्र्यंबकेश्वर के कुशावर्त तीर्थ पर दोपहर 12:02 बजे देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों यह कार्यक्रम होगा।

हिंदू पंचांग के मुताबिक जब सूर्य और चंद्रमा कर्क राशि में और बृहस्पति (गुरु) सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, तब नाशिक और त्र्यंबकेश्वर में सिंहस्थ कुंभमेला होता है। करीब 21 महीने चलने वाले इस आयोजन में देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु गोदावरी नदी में पवित्र स्नान के लिए आते हैं। हिंदू धर्म के लोगों की गहरी श्रद्धा है कि इस दौरान नदियों का पानी सामान्य पानी नहीं रहता, वह अमृत बन जाता है और उस समय शाही स्नान करने से पुण्य मिलता है। इस मेले में शैव और वैष्णव परंपरा के अखाड़े शामिल होंगे।

मेले की अधिकृत शुरुआत भले अक्टूबर 2026 में हो रही हो, मुख्य धार्मिक विधि और सबसे ज्यादा भीड़ का वक्त अगस्त और सितंबर 2027 में रहेगा। प्रमुख तारीखें इस तरह हैं। 29 जुलाई 2027 को नगर प्रदक्षिणा होगी, यानी नाशिक शहर की पवित्र परिक्रमा। 2 अगस्त 2027 को आषाढ़ सोमवती अमावस्या पर पहला अमृत स्नान (शाही स्नान) होगा। 31 अगस्त 2027 को श्रावण अमावस्या पर दूसरा और मुख्य अमृत स्नान होगा। भाद्रपद एकादशी पर तीसरा अमृत स्नान दो दिन होगा: 11 सितंबर 2027 को सिर्फ नाशिक में, वैष्णव अखाड़ों के लिए, और 12 सितंबर 2027 को सिर्फ त्र्यंबकेश्वर में, शैव अखाड़ों के लिए। 24 जुलाई 2028 को ध्वजावतरण यानी ध्वज उतारने के साथ मेले का अधिकृत समापन होगा।

करोड़ों श्रद्धालुओं और साधु-संतों के स्वागत के लिए महाराष्ट्र सरकार ने करीब 24,225 करोड़ रुपये से ज्यादा की विकास योजना मंजूर की है। पेशवाकालीन परंपरा के मुताबिक शैव साधु त्र्यंबकेश्वर में कुशावर्त तीर्थ पर और वैष्णव अखाड़े व महंत नाशिक के रामकुंड और तपोवन इलाके में स्नान करेंगे। उनके रहने के लिए तपोवन में बड़ा साधु ग्राम बनाया जा रहा है।

गोदावरी पर बढ़ती भीड़ को संभालने के लिए दोनों शहरों में नए और सुरक्षित चौड़े घाट बनाए गए हैं। नदी के पात्र की सफाई के लिए खास मुहिम भी चलाई गई है। ट्रैफिक के लिए शहर को चारों तरफ से जोड़ने वाले रिंग रोड तैयार हैं, और भीड़ वाले दिनों के लिए खास पार्किंग जोन और होल्डिंग एरिया बनाए गए हैं।

श्रद्धालुओं को जानकारी देने के लिए Kumbh Mela Portal नाम की वेबसाइट शुरू की गई है। भीड़ के दिनों के अलावा आने वाले पर्यटकों के लिए हेली-टूरिज्म यानी हेलिकॉप्टर सफर की भी योजना है। सुरक्षा और सेहत के लिए अस्थायी बड़े अस्पताल, 24 घंटे एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पूरे इलाके पर नजर रखने के लिए हजारों सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।

कुंभ का मतलब घड़ा या कलश होता है। पौराणिक कथा के मुताबिक सत्ययुग में देवताओं और दानवों ने समुद्रमंथन किया तो 14 रत्न निकले, जिनमें आखिरी रत्न अमृत कुंभ था। उसे पाने के लिए देवताओं और दानवों के बीच 12 दिन और 12 रात लड़ाई चली, जो इंसानी दुनिया के 12 साल के बराबर बताई गई है। इस खींचतान में अमृत की कुछ बूंदें धरती के चार पवित्र ठिकानों पर गिरीं: प्रयागराज (गंगा-यमुना-सरस्वती संगम), हरिद्वार (गंगा), उज्जैन (शिप्रा) और नाशिक-त्र्यंबकेश्वर (गोदावरी)। इसी वजह से हर 12 साल में इन चार जगहों पर बारी-बारी से कुंभमेला लगता है।

नाशिक के मेले को सिंहस्थ इसलिए कहा जाता है कि इस दौरान गुरु (बृहस्पति) सिंह राशि में प्रवेश करता है। यह मेला नाशिक और त्र्यंबकेश्वर, दो जगहों में बंटा है, जहां शैव (भगवान शिव को पूजने वाले) और वैष्णव (भगवान विष्णु को पूजने वाले) पंथ के साधु अलग-अलग जगह धार्मिक विधि करते हैं। मान्यता है कि खास खगोलीय ग्रहस्थिति में, यानी शाही स्नान के दिन, नदी में डुबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं, रोगों से मुक्ति मिलती है और जन्म-मरण के फेरे से छूटकर मोक्ष मिलता है। यूनेस्को (UNESCO) ने कुंभमेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) के तौर पर मान्यता दी है।

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