नाना पाटेकर ने चिता के लिए पहले ही रख ली थी 12 मन लकड़ी, 2023 में कही थी बात
गुरुवार को 75 साल की उम्र में दुनिया छोड़ने वाले नाना पाटेकर का सितंबर 2023 का इंटरव्यू फिर चर्चा में है, जिसमें उन्होंने अपनी मौत और अंतिम संस्कार पर खुलकर बात की थी।
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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 को वरिष्ठ अभिनेता नाना पाटेकर ने 75 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। भारतीय सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने वाले नाना को रंगमंच का शेर, किसानों का साथी और कारगिल युद्ध का वीर सैनिक कहा जाता था। उनके जाने से पूरे देश में शोक की लहर है।
इसी बीच उनकी सोच और बेहद हकीकत से जुड़ी जिंदगी का एक अलग पहलू सामने आया है। उन्होंने अपनी मौत के बारे में पहले ही बात कर रखी थी और आखिरी सफर की तैयारी भी कर रखी थी।
सितंबर 2023 के एक इंटरव्यू में नाना पाटेकर ने मौत और अपने अंतिम संस्कार पर भावुक लेकिन साफ शब्दों में बात की थी। उन्हें मौत से न कोई डर था, न कोई भ्रम। उन्होंने कहा था, "मुझे मौत पर पूरा भरोसा है। मेरे आखिरी सफर के लिए 12 मन (करीब 480 किलो) लकड़ी लगेगी और यही मेरी आखिरी जायदाद है। इन्हीं लकड़ियों के साथ मैं इस दुनिया से जाऊंगा। मैंने अपनी ये 12 मन लकड़ी पहले ही लाकर रख दी है। वो एकदम सूखी है और मुझे उसी पर जलाना।"
अंतिम संस्कार में गीली लकड़ी क्यों न इस्तेमाल की जाए, इसके पीछे नाना की दलील सुनकर कोई भी हैरान रह जाए। मजाकिया लेकिन गंभीर लहजे में उन्होंने कहा था, "मेरी चिता के लिए गीली लकड़ी बिल्कुल मत लगाना। गीली लकड़ी से धुआं निकलेगा। वहां जमा मेरे दोस्तों की आंखों में वो धुआं जाएगा और उनकी आंखों से पानी आएगा। फिर मरते वक्त मुझे बेवजह यह गलतफहमी हो जाएगी कि ये लोग मेरे लिए रो रहे हैं! कम से कम मरते वक्त तो मुझे ऐसी गलतफहमी नहीं चाहिए।"
इंसान के नश्वर होने पर बोलते हुए नाना ने सबको एक कीमती सलाह भी दी थी। उन्होंने कहा था, "आप आज मरेंगे, तो 2 से 4 दिन बाद आपको कोई याद नहीं करेगा। इसीलिए मैंने अपने लोगों से कह रखा है कि मेरे जाने के बाद मेरी फोटो भी मत लगाना। मुझे पूरी तरह भूल जाओ, वही बहुत जरूरी है।"
अपने परिवार के बारे में बताते हुए नाना भावुक हो गए थे। उन्होंने कहा था, "हम कुल 7 भाई-बहन थे। लेकिन धीरे-धीरे सब चले गए, अब सिर्फ मैं अकेला बचा हूं। मां-बाप, भाई-बहन, कोई नहीं बचा। इसलिए अब मैं इस दुनिया का रहा ही नहीं, मेरे सारे अपने उधर दूसरी दुनिया में मेरा इंतजार कर रहे हैं।" उनके ये शब्द दिल को झकझोर देने वाले थे।
नाना का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजिरा में हुआ। उन्होंने मुंबई के सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से पढ़ाई पूरी की और रंगमंच से अपने अभिनय के सफर की शुरुआत की। 1978 में फिल्म 'गमन' से उन्होंने पर्दे पर कदम रखा। इसके बाद 'अंकुश', 'प्रतिघात', 'तिरंगा', 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'अग्निसाक्षी', 'खामोशी: द म्यूजिकल', 'अब तक छप्पन', 'अपहरण', 'राजनीति' और 'वेलकम' जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी।
नाना पाटेकर को 3 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। 'परिंदा' के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, 'क्रांतिवीर' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और 'अग्निसाक्षी' के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार उनके नाम रहा। 2013 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित किया। उन्होंने 'प्रहार: द फाइनल अटैक' का निर्देशन और लेखन भी किया। इसके अलावा अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर उन्होंने 'नाम फाउंडेशन' (NAAM Foundation) की स्थापना की, जो आज भी ग्रामीण इलाकों में किसानों की मदद के लिए दिन-रात काम कर रही है।