75 की उम्र में नहीं रहे नाना पाटेकर, परदे पर छोड़ गए ये दमदार डायलॉग
गोवा के मनिपाल अस्पताल में दिल के दौरे से नाना पाटेकर का निधन हुआ। नटसम्राट, क्रांतिवीर, यशवंत और राजनीति जैसी फिल्मों के उनके 10 मशहूर डायलॉग।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। 75 साल की उम्र में गोवा के मनिपाल अस्पताल में सुबह इलाज चल रहा था, तभी उन्हें दिल का तेज दौरा पड़ा और उन्होंने आखिरी सांस ली। अपने अनोखे अंदाज और बुलंद आवाज से भारतीय सिनेमा के इतिहास में गहरी छाप छोड़ने वाले इस महान कलाकार ने विलेन से लेकर हीरो तक और कॉमेडी से लेकर ट्रैजेडी तक, हर तरह का रोल दमदार तरीके से निभाया। उनके जाने से फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी खाली जगह बन गई है जो कभी भरी नहीं जा सकेगी।
दर्शकों को खूब हंसाने वाले और आंखों में पानी ला देने वाले नाना आज भले साथ नहीं हैं, लेकिन परदे पर उन्होंने जिन डायलॉग को अमर कर दिया और उनकी जो खास शैली थी, वह चाहने वालों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी।
नाना ने 1978 की फिल्म गमन से अपना एक्टिंग का सफर शुरू किया था। उनकी डायलॉग डिलीवरी बेहद नैचुरल और असली जैसी होती थी। दर्शकों को लगता था कि वे परदे पर एक्टिंग नहीं कर रहे, बल्कि असल जिंदगी में बात कर रहे हैं। थिएटर में सीटियां और तालियां बटोरने वाली उनकी 10 सबसे लोकप्रिय फिल्मों के ये यादगार डायलॉग एक नजर में।
सबसे पहले नटसम्राट। मराठी रंगभूमि और सिनेमा के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज इस फिल्म के संवाद आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं। "कोई घर देगा क्या घर? एक तूफ़ान को कोई घर देगा क्या घर?" इसके अलावा, "टू बी ऑर नॉट टू बी... जिएं कि मरें, यही एक सवाल है। इस दुनिया के कचरे के ढेर पर जूठी पत्तल का टुकड़ा बनकर जिएं बेशर्म, लाचार, खुशी से?" और "हजारों की संपत्ति जमा करके गुलाल और बुक्के की तरह उड़ा दी, वही यह नटसम्राट अपने ही बच्चों के घर में चोर ठहरा!"
क्रांतिवीर (1994) का डायलॉग नाना के करियर का सबसे मशहूर डायलॉग बना, जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा का महानायक बना दिया। "आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने?" इसी फिल्म के दो और संवाद हैं: "बता ये मुसलमान का खून है या ये हिन्दू का खून है, बता!" और "साले अपने खुद के देश में एक सुई नहीं बना सकते... और हमारा देश तोड़ने का सपना देखते!"
यशवंत (1997) के दोनों डायलॉग आम आदमी के गुस्से को आवाज देते हैं और रोजमर्रा की बातचीत में भी खूब चले। "एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है!" और "सौ में से अस्सी बेईमान, फिर भी मेरा देश महान!"
परिंदा (1989) में निभाए 'अण्णा' के किरदार ने नाना को उनका पहला राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया। इस फिल्म से: "दुख का इलाज भूलना है, और भूलने के लिए आदमी को जीना पड़ता है।" और "धंधे में कोई किसी का भाई नहीं, कोई किसी का बेटा नहीं..."
तिरंगा (1993) राजकुमार और नाना पाटेकर की जुगलबंदी से सजी फिल्म थी। इसका यह संवाद आज भी बेहद लोकप्रिय है: "अपना तो उसूल है... पहले लात, फिर बात, उसके बाद मुलाकात।"
अब तक छप्पन में नाना ने खाकी वर्दी वाले सख्त पुलिस अफसर का रोल हूबहू निभाया था। उसका डायलॉग: "हम सब सिस्टम का हिस्सा हैं, सिस्टम डिसाइड करता है, अपुन फॉलो करता है..."
प्रहार देशभक्ति और फौजियों की जिंदगी दिखाने वाली फिल्म थी, जिसमें नाना का दिया यह संदेश बहुत असरदार रहा: "एक सैनिक के लिए उसका देश ही उसका परिवार होता है..."
वेलकम (2007) में 'उदय शेट्टी' का कॉमेडी रोल निभाकर नाना ने नई पीढ़ी को भी अपनी एक्टिंग का दीवाना बना दिया। "भगवान का दिया हुआ सब कुछ है... दौलत है, शौहरत है, इज्जत है।" और "साला ये दुःख काहे खत्म नहीं होता बे..."
राजनीति (2010) में राजनीतिक बिसात पर चली जाने वाली चालों पर टिप्पणी करते नाना के डायलॉग खूब चर्चा में रहे। "बेटर है तुम अपना इरादा बदल दो, नहीं तो मैं तुम्हारा नक्शा बदल दूँगा।", "राजनीति में हमेशा जीत को ही मान मिलता है।" और "फैसले सही या गलत नहीं होते, वे वक्त और हालात के हिसाब से लिए जाते हैं।"
नाना पाटेकर की एक्टिंग की सबसे बड़ी खासियत उनकी अनोखी डायलॉग डिलीवरी थी। वे फिल्मों में इतनी सहजता से संवाद बोलते थे कि दर्शकों को वह नाटकीय नहीं, पूरी तरह असली लगता था। यही शैली उन्हें हिंदी और मराठी फिल्म इंडस्ट्री के महान और अटल कलाकारों की सूची में सबसे ऊपर बिठाती है।