नाग नदी की सफाई अटकी, 1,926.99 करोड़ की योजना अब भी फाइलों में
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की मंजूरी के तीन साल से ज्यादा बाद भी नाग नदी प्रदूषण निवारण परियोजना में जमीन पर कोई बड़ा काम शुरू नहीं हुआ है।
नागपुर की नाग नदी को बरसों के प्रदूषण और अनदेखी से बचाने के लिए बनी 1,926.99 करोड़ रुपये की नाग नदी प्रदूषण निवारण परियोजना को केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय से मंजूरी मिले तीन साल से ज्यादा हो चुके हैं। इसके बावजूद परियोजना अब भी ज्यादातर फाइलों, टेंडर की प्रक्रिया और प्रशासनिक औपचारिकताओं में ही अटकी है। नदी किनारे कोई बड़ा काम दिखाई नहीं देता।
परियोजना का दायरा बड़ा है। इसमें 520 किलोमीटर का सीवरेज नेटवर्क बिछाया जाना है, कुल 92 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) क्षमता के तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनने हैं और सात नए पंपिंग स्टेशन लगने हैं। इसके अलावा बिना साफ किया गया गंदा पानी नदी में जाने से रोकने के लिए इंटरसेप्शन और डायवर्जन का काम भी होना है।
खर्च तीन स्तर पर बंटा है। केंद्र सरकार 60 फीसदी, महाराष्ट्र सरकार 25 फीसदी और नागपुर महानगरपालिका (NMC) बाकी 15 फीसदी देगी। इतनी रकम तय होने के बावजूद अब तक निर्माण का काम नजर नहीं आया है।
परियोजना को पांच कॉन्ट्रैक्ट पैकेज (CP) में बांटा गया है। अब तक सिर्फ पैकेज CP-5 में थोड़ा काम हुआ है, जो सीवरेज से जुड़ा नहीं है। यह मोक्षधाम के इलेक्ट्रिक श्मशान का 1.32 करोड़ रुपये का काम है। नदी में गंदा पानी रोकने, उसे साफ करने और नदी को बचाने के असली मकसद से इसका सीधा रिश्ता नहीं है।
उत्तर जोन के सीवर नेटवर्क वाला पैकेज CP-3, जिसकी कीमत 253.17 करोड़ रुपये है, बोलियों की तकनीकी जांच के बाद लेटर ऑफ इंटेंट (LOI) जारी करने के स्तर तक पहुंचा है। पैकेज CP-4 अभी टेंडर की प्रक्रिया में ही अटका है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने वाले पैकेज CP-2 का अनुमानित खर्च 415.79 करोड़ रुपये है और उसके ड्राफ्ट टेंडर दस्तावेजों की जांच चल रही है।
सबसे ज्यादा चिंता पैकेज CP-1 को लेकर है। यह 411.72 करोड़ रुपये का है और इंटरसेप्शन व डायवर्जन के जरूरी काम इसी में आते हैं। इसमें अभी शुरुआती सर्वे और ड्रॉइंग व डिजाइन तैयार करने का काम चल रहा है। इन कामों के बिना गंदा पानी नदी में जाने से रोकने का मुख्य मकसद पूरा नहीं हो सकता। यानी सीवर नेटवर्क, ट्रीटमेंट प्लांट और इंटरसेप्शन जैसे सबसे अहम हिस्से जमीन पर उतरने से अभी दूर हैं।
2024 के आखिर में टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) को प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट बनाया गया था। उम्मीद थी कि इससे काम को रफ्तार मिलेगी। लेकिन इस नियुक्ति के बाद भी परियोजना क्षेत्र में सिविल काम की तैयारी दिखाई नहीं देती। सीवरेज नेटवर्क, इंटरसेप्शन सिस्टम और पर्याप्त ट्रीटमेंट क्षमता के बिना गंदा पानी नदी के लिए खतरा बना रहेगा।
NMC के कार्यकारी अभियंता राजेश दुफारे ने समयसीमा समझाई। उनके मुताबिक परियोजना की कुल मंजूर अवधि आठ साल है, लेकिन महानगरपालिका काम तेज करके सारा काम पांच साल में पूरा करना चाहती है। दुफारे ने कहा, "परियोजना की कुल मंजूर अवधि आठ साल की है, लेकिन महानगरपालिका काम में तेजी लाकर सभी काम पांच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखती है। शुरुआती सर्वे और टेंडर की प्रक्रिया चल रही है।"
सूत्रों के मुताबिक CP-3 की तकनीकी जांच के बाद बाकी बड़े सीवरेज और सीवेज ट्रीटमेंट कामों का फिजिकल काम अगले वित्त वर्ष में शुरू होने की संभावना है। मंजूरी से अमल तक पहले ही काफी वक्त निकल चुका है। ऐसे में बड़ा काम अगले वित्त वर्ष में शुरू होने की बात से पांच साल के लक्ष्य पर भी सवाल उठते हैं।
सवाल अब यह नहीं है कि कागज पर योजना कितनी बड़ी दिखती है। सवाल यह है कि नागपुर के लोग मशीनें, मजदूर, सीवर लाइनें और ट्रीटमेंट प्लांट जमीन पर कब देखेंगे। जब तक सीवरेज नेटवर्क नहीं बिछता, ट्रीटमेंट प्लांट नहीं बनते और गंदा पानी रोका नहीं जाता, तब तक नाग नदी की हालत नहीं सुधरेगी।
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