मार्टिन ल्यूथर किंग ज्यूनियर: 35 साल की उम्र में नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के शख्स
अहिंसा के रास्ते पर चलकर अमेरिका की नागरिक अधिकार लड़ाई का चेहरा बने डॉ. किंग की संघर्ष भरी कहानी।
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अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन के अगुवा डॉ. मार्टिन ल्यूथर किंग ज्यूनियर ने सिर्फ अमेरिका के अश्वेत लोगों की ज़िंदगी को नई दिशा नहीं दी, बल्कि पूरी दुनिया को भेदभाव से मुक्त और बराबरी पर टिके समाज का सपना देखना सिखाया। उनके अहिंसक नेतृत्व की बदौलत अमेरिका के अफ्रीकी अमेरिकी नागरिकों ने नस्लीय बराबरी की दिशा में कुछ ही दशकों में उससे ज़्यादा असली तरक्की कर दिखाई, जो पिछले 350 सालों में नहीं हो पाई थी। उन्हें आधुनिक अमेरिका में अहिंसा के सबसे बड़े पैरोकारों और दुनिया के इतिहास के सबसे असरदार अहिंसक नेताओं में गिना जाता है।
डॉ. किंग का जन्म 15 जनवरी 1929 को जॉर्जिया के अटलांटा में हुआ। पैदाइश के वक्त उनका नाम माइकल ल्यूथर किंग ज्यूनियर रखा गया था, जिसे बाद में उनके पिता ने बदलकर मार्टिन कर दिया। उनके परिवार में बैप्टिस्ट चर्च की सेवा की लंबी परंपरा थी। उनके दादा 1914 से 1931 तक अटलांटा के मशहूर एबेनेज़र बैप्टिस्ट चर्च के पादरी रहे। दादा के बाद यह ज़िम्मेदारी किंग के पिता ने संभाली, और 1960 से अपनी मौत तक खुद मार्टिन ल्यूथर किंग ज्यूनियर वहां सह-पादरी रहे।
जॉर्जिया के अलग-अलग बंटे हुए स्कूलों में, जहां नस्लभेद का साया था, उनकी शुरुआती पढ़ाई हुई। बचपन से ही तेज़ दिमाग वाले मार्टिन ने सिर्फ पंद्रह साल की उम्र में हाईस्कूल पूरा कर लिया। 1948 में उन्होंने अटलांटा के अश्वेतों के मशहूर मोरहाउस कॉलेज से बी.ए. की डिग्री ली। 1951 में पेंसिल्वेनिया के क्रोज़र थियोलॉजिकल सेमिनरी से बी.डी. की डिग्री मिली, जहां ज़्यादातर श्वेत छात्र थे, फिर भी उन्हें क्लास का प्रमुख चुना गया। 1955 में बॉस्टन यूनिवर्सिटी से उन्होंने पीएच.डी. की। बॉस्टन में ही उनकी मुलाकात कोरेटा स्कॉट से हुई, जो बेहद समझदार और कलात्मक शख्सियत थीं। दोनों की शादी हुई और उनके चार बच्चे हुए।
1954 में डॉ. किंग अलाबामा के मॉन्टगोमरी में डेक्स्टर एवेन्यू बैप्टिस्ट चर्च के पादरी बने। दिसंबर 1955 में उन्होंने आधुनिक अमेरिकी इतिहास के पहले बड़े अहिंसक आंदोलन, मॉन्टगोमरी बस बहिष्कार, की अगुवाई की, जो लगातार 382 दिन चला। इस दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया, उनके घर पर बम फेंका गया और उन्हें निजी तौर पर अपमान भी झेलना पड़ा, लेकिन वे अहिंसा के रास्ते से नहीं हटे। आखिरकार 21 दिसंबर 1956 को अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने नस्लभेद वाले कानूनों को असंवैधानिक करार दिया। 1957 में उन्होंने सदर्न क्रिश्चियन लीडरशिप कॉन्फ्रेंस (SCLC) की स्थापना की। 1957 से 1968 के बीच उन्होंने 60 लाख मील से ज़्यादा का सफर किया और 2,500 से ज़्यादा भाषण दिए।
1963 में वे वॉशिंगटन, डी.सी. पहुंचे, जहां उन्होंने ढाई लाख लोगों के विशाल शांतिपूर्ण मार्च की अगुवाई की और लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों से अपना दुनिया भर में मशहूर भाषण 'मेरा एक सपना है' दिया। उसी साल 'टाइम' पत्रिका ने उन्हें 'मैन ऑफ द ईयर' चुना।
1964 में 35 साल की उम्र में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया और वे यह पुरस्कार पाने वाले दुनिया के सबसे कम उम्र के शख्स बने। पुरस्कार का ऐलान होने पर उन्होंने मिली 54,123 डॉलर की पूरी रकम नागरिक अधिकार आंदोलन को दान कर दी। 4 अप्रैल 1968 को टेनेसी के मेम्फिस शहर में नगर निगम के कचरा कामगारों के समर्थन में मार्च की अगुवाई करते हुए, एक मोटल की बालकनी पर खड़े डॉ. किंग को गोली मारकर हत्या कर दी गई। फिर भी बराबरी और अहिंसा की उनकी मशाल आज भी दुनिया भर के मानवाधिकार आंदोलनों को राह दिखा रही है।