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22:34 IST

किचन का कचरा आधा करना है? दो डिब्बे, कपड़े की थैली और नाप से खाना बनाने की आदत डालें

सब्जी के छिलके, बचा खाना और खाली डिब्बे फेंकने से पहले इनका इस्तेमाल सोचें। आदतें थोड़ी बदलने से घर का कचरा आधे से ज्यादा घट सकता है।

किचन का कचरा आधा करना है? दो डिब्बे, कपड़े की थैली और नाप से खाना बनाने की आदत डालें तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

रोज खाना बनाते वक्त कचरा तो निकलता ही है, और उससे किचन गंदा हो जाता है। सब्जी छांटने के बाद बचा कचरा, फलों के छिलके, चाय छानने के बाद की पत्ती, खाली थैलियां और बचा हुआ खाना, ये सब मिलकर किचन का कचरे का डिब्बा दिन भर में भर देते हैं। डिब्बा वक्त पर खाली न किया जाए तो पूरे घर में बदबू फैल जाती है। कई महिलाएं सोचती हैं कि इस कचरे का आखिर क्या करें। अपनी आदतों में थोड़ा बदलाव कर लिया जाए तो आधे से ज्यादा कचरा कम हो सकता है। आइए जानें कैसे।

पहला नियम यह है कि दो डिब्बे रखें। गीला और सूखा कचरा कभी एक साथ न डालें। भारत में ज्यादातर घरों में सारा कचरा एक ही थैली में डाल दिया जाता है, इसी वजह से बदबू आती है। इसलिए दो अलग डिब्बे रखिए।

एक डिब्बे में सिर्फ गीला कचरा डालें, जैसे सब्जी के छिलके, फलों के टुकड़े, अंडे के छिलके, बचा हुआ चावल और खाने से जुड़ा सामान। दूसरे डिब्बे में सूखा कचरा रखें, यानी प्लास्टिक, कागज और कांच। ऐसा करने से बदबू नहीं आती, और पालिका की गाड़ी आने पर उन्हें कचरा देना भी आसान हो जाता है। शौक हो तो गीले कचरे से आप बालकनी में ही पौधों के लिए खाद भी बना सकते हैं।

दूसरी बात, छिलके फेंकने से पहले दो बार सोचिए। हम छिलका दिखते ही सीधे कचरे में डाल देते हैं, पर हर छिलका डिब्बे में जाने के लिए नहीं होता। कुछ छिलकों में भरपूर विटामिन होते हैं। मिसाल के तौर पर कद्दू और लौकी के छिलकों की चटनी स्वाद में बहुत अच्छी लगती है। आलू के छिलकों से कुरकुरे वेफर्स बन जाते हैं। मूली के पत्ते, पत्तागोभी के ऊपर के पत्ते और फूलगोभी के डंठल की भी सब्जी बनती है। इन्हें अच्छे से धोकर इस्तेमाल करें तो एक नई डिश भी मिल जाती है और कचरा भी कम होता है।

तीसरी आदत है कपड़े की थैली की। सब्जी मार्केट जाकर हर सब्जी के लिए अलग प्लास्टिक की थैली लेना हमारी आदत बन गई है। घर आने पर इन थैलियों का ढेर लग जाता है और फिर वे फेंक दी जाती हैं। इससे बेहतर है कि घर से निकलते वक्त ही एक कपड़े की थैली साथ ले लें। एक बार खरीद ली तो वह 2-3 साल आराम से चलती है, और धुल भी जाती है। घर में पड़ी पुरानी प्लास्टिक की थैलियां भी न फेंकें। उन्हें सब्जीवाले को वापस दे आइए, वह उन्हीं में सब्जी दे देगा। इससे प्लास्टिक काफी घटेगा।

चौथी बात, खाना नाप से बनाइए। सबसे ज्यादा कचरा बचे हुए खाने से होता है। भारतीय घरों में जरूरत से ज्यादा खाना बन जाता है। बचा तो फ्रिज में रख देते हैं, और 3 दिन बाद वही खाना फेंक दिया जाता है। ऐसा करने के बजाय पहले ही तय कर लें कि घर में कौन कितना खाने वाला है, और उसी हिसाब से खाना बनाएं, तो खाना बर्बाद नहीं होगा। हफ्ते का मेन्यू पहले से तय कर लें तो यह भी नाप-तोल कर सकते हैं कि घर में कितना किराना आएगा। इससे ज्यादा खाना बनेगा ही नहीं और बर्बाद भी नहीं होगा। बचे हुए चावल का पुलाव बन जाता है, और चपाती का तड़के वाला चिड़वा या लड्डू भी बनता है।

पांचवीं बात, खाली बोतलें और डिब्बे न फेंकें। तेल का डिब्बा खत्म हुआ या अचार का मर्तबान खाली हुआ तो हम उसे फेंक देते हैं, जबकि ये चीजें बड़े काम की होती हैं। कांच के मर्तबान धोकर उनमें नमक, चीनी और दालें भरकर रख सकते हैं, इससे किचन का लुक ही बदल जाता है। पुराने प्लास्टिक के डिब्बों में पौधे लगाए जा सकते हैं। पुराने सूती कपड़े फाड़कर उनके पोछे बन जाते हैं। नए खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

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