झाडीपट्टी रंगभूमी के नाटकों को इजाजत मिले, हजारों का रोजगार दांव पर: ब्राह्मणवाडे
कांग्रेस नेता महेंद्र ब्राह्मणवाडे ने पूर्व विदर्भ में झाडीपट्टी रंगभूमी के नाट्यप्रयोगों को तुरंत अनुमति देने की मांग की है।
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गडचिरोली/चंद्रपुर : पूर्व विदर्भ के कलाकार और नाट्यसंस्थाएं इन दिनों मुश्किल में हैं। वजह यह है कि झाडीपट्टी रंगभूमि के नाटकों को इजाजत नहीं दी जा रही। आरोप है कि प्रशासन अलग-अलग कारण बताकर नाट्यप्रयोगों की अनुमति रोक रहा है। इसी को लेकर कांग्रेस नेता महेंद्र ब्राह्मणवाडे ने मांग की है कि नाट्यप्रयोगों को तुरंत अनुमति दी जाए।
गडचिरोली और चंद्रपुर समेत पूर्व विदर्भ के छह जिलों को झाडीपट्टी रंगभूमि की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत मिली है। गांव-देहात के लोगों के मनोरंजन के साथ-साथ समाज को जागरूक करने का असरदार जरिया बनकर इस रंगभूमि ने अपनी अलग पहचान बनाई है। हर साल इस इलाके में सैकड़ों नाटक होते हैं। लेकिन इस बार प्रशासन की ओर से अलग-अलग कारण गिनाकर अनुमति नहीं दी जा रही है। इससे रंगभूमि से जुड़े कलाकारों, नाट्यसंस्थाओं और इस धंधे पर निर्भर हजारों लोगों के रोजगार का सवाल खड़ा हो गया है।
ब्राह्मणवाडे का कहना है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से ले और नाट्यप्रयोगों को इजाजत दे।
झाडीपट्टी रंगभूमि पूर्व विदर्भ के सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा है। यहां ऐसे नाटक पेश किए जाते हैं जो सामाजिक, शैक्षणिक और पारिवारिक विषयों पर बात करते हैं, और साथ ही गांव के दर्शकों का भरपूर मनोरंजन भी करते हैं। ग्रामीण इलाकों के कई प्रतिभाशाली कलाकारों को अपनी कला दिखाने के लिए यह रंगभूमि अपना मंच देती है। इसलिए इसका महत्व सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है। यह स्थानीय कला, संस्कृति और रोजगार से भी जुड़ी हुई है।
झाडीपट्टी नाट्य व्यवसाय से हर साल सौ करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार होता है। इस धंधे में सिर्फ कलाकार ही नहीं, बल्कि नाटकों के लेखक, निर्देशक, संगीतकार, वादक, डेकोरेशन और मंडप का काम करने वाले, वाहन चालक और कई दूसरे लोग भी शामिल रहते हैं। नाटकों के आयोजन से स्थानीय बाजार को भी रफ्तार मिलती है। नतीजा यह कि हजारों लोगों को सीधे और परोक्ष रूप से रोजगार मिलता है।
कई कलाकार और तकनीशियन साल भर झाडीपट्टी नाटकों से होने वाली कमाई पर ही निर्भर रहते हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों के कलाकारों के लिए यह धंधा गुजर-बसर का बड़ा सहारा है। ऐसे में अगर नाटकों की अनुमति नहीं मिली, तो असर सिर्फ नाट्यसंस्थाओं पर नहीं पड़ेगा, पूरे नाट्य व्यवसाय से जुड़े हर तबके पर पड़ेगा। इसलिए ब्राह्मणवाडे ने मांग की है कि अनुमति की प्रक्रिया में आ रही अड़चनें दूर की जाएं और प्रशासन नाट्यप्रयोगों को विधिवत इजाजत दे।
ब्राह्मणवाडे ने यह भी साफ किया कि झाडीपट्टी रंगभूमि पूर्व विदर्भ की सांस्कृतिक पहचान है और इसके सहारे कई कलाकारों ने अपनी जिंदगी बनाई है। कलाकारों, नाट्यसंस्थाओं और इससे जुड़े कारोबारियों को न्याय दिलाना जरूरी है। प्रशासन इस सवाल को सिर्फ अनुमति की प्रक्रिया के नजरिए से न देखे, बल्कि इसके पीछे की सांस्कृतिक परंपरा और हजारों लोगों के रोजगार का भी ख्याल रखे, यह बात भी उन्होंने कही।