जापानी भाषा सीखकर बनाएं करियर, प्रियंका सैतवडेकर ने बताया अपना सफर और सफलता का मंत्र
जापानी भाषा की जानकार प्रियंका सैतवडेकर ने नवदुर्गा पॉडकास्ट में बताया कि विदेशी भाषा से करियर की कौन सी राह खुलती है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
आज हर कोई करियर में कुछ अलग करना चाहता है। सवाल यह है कि क्या कोई विदेशी भाषा सीखकर भी करियर को नई दिशा दी जा सकती है? जापानी, जर्मन, फ्रेंच और कोरियन जैसी भाषाओं की तरफ आज नौजवानों का रुझान बढ़ रहा है। लेकिन शुरुआत कहां से करें, कौन सी भाषा चुनें और उससे नौकरी के कौन से मौके मिल सकते हैं, इन सब सवालों के जवाब जापानी भाषा की जानकार प्रियंका सैतवडेकर (Priyanka Saitavadekar) ने दिए।
प्रियंका ने बारहवीं की छुट्टियों में यूं ही जापानी भाषा सीखना शुरू किया था और आगे चलकर इसी भाषा से अपने करियर को नई दिशा दी। शुरुआत में उनके पास करियर की कोई बड़ी योजना नहीं थी। बारहवीं की परीक्षा खत्म होने के बाद उन्होंने और उनकी सहेली ने तय किया कि छुट्टियों में कुछ नया सीखा जाए। दोनों एक भाषा प्रशिक्षण संस्था में गईं, जहां जर्मन और जापानी भाषा सीखने के विकल्प थे। ज्यादा सोचे बिना दोनों ने अलग-अलग भाषाएं चुनीं। सहेली ने जर्मन ली और प्रियंका ने जापानी। सोच यह थी कि बुनियादी कोर्स पूरा होने के बाद दोनों एक-दूसरे को अपनी भाषा सिखाएंगी। आगे चलकर जापानी भाषा में उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई। जो पढ़ाई सिर्फ टाइमपास के लिए शुरू हुई थी, वही उनकी जिंदगी में अहम साबित हुई।
बहुत से लोग मानते हैं कि जापानी भाषा बेहद मुश्किल है। प्रियंका के मुताबिक जापानी व्याकरण की कुछ खासियतें मराठी बोलने वालों के लिए काम की हो सकती हैं। दोनों भाषाओं के वाक्य बनाने के तरीके में कुछ हद तक समानता है, इसलिए मराठी भाषियों को जापानी वाक्यों की बनावट समझना अपेक्षाकृत आसान लग सकता है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि 'वाताशी वा प्रियंका देसु' का मतलब है 'मैं प्रियंका हूं', और 'वाताशी वा सेन्सेई देसु' का मतलब है 'मैं शिक्षक हूं'।
जापानी में अंग्रेजी की तरह 'a', 'an' और 'the' जैसे articles नहीं होते। कई संज्ञाओं में व्याकरण के हिसाब से लिंग का भेद भी नहीं होता। इसी वजह से शुरुआती पढ़ाई आसान लग सकती है। हालांकि लिखने का तरीका, शब्दभंडार और आदर वाली भाषा के नियम सीखने के लिए नियमित अभ्यास जरूरी है।
जापानी की तीन मुख्य लिपियां भी इसकी खासियत हैं: कांजी, हिरागाना और काताकाना। कांजी में अर्थ बताने वाले चिन्ह इस्तेमाल होते हैं। हिरागाना में जापानी शब्द और व्याकरण के हिस्से लिखे जाते हैं, जबकि काताकाना ज्यादातर दूसरी भाषाओं से आए शब्द और विदेशी नाम लिखने के काम आती है। ये तीनों लिपियां शुरू में कठिन लग सकती हैं, पर प्रियंका ने बताया कि इनकी पढ़ाई दिलचस्प है।
प्रियंका ने साफ किया कि सिर्फ भाषा सीखने तक न रुककर, अपनी असली पढ़ाई के साथ किसी विदेशी भाषा का ज्ञान जोड़ना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। मिसाल के तौर पर जिस विद्यार्थी ने आईटी या इंजीनियरिंग पढ़ी हो और जो जापानी भी जानता हो, उसे जापानी कंपनियों में काम के मौके मिल सकते हैं। जापान में टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, डिजिटल मार्केटिंग और एनिमेशन जैसे कई क्षेत्रों में काम है। भारत में काम कर रही जापानी कंपनियों में भी भाषा जानने वाले उम्मीदवारों को फायदा हो सकता है। अनुवाद, दस्तावेजों के ट्रांसलेशन, कारोबारी बातचीत और अलग-अलग प्रोजेक्ट के काम में विदेशी भाषा काम आ सकती है।
कई विद्यार्थियों को यह सवाल सताता है कि जापानी, जर्मन, कोरियन, फ्रेंच या स्पेनिश में से कौन सी भाषा सीखें। प्रियंका के मुताबिक भाषा चुनते वक्त सबसे पहले अपना पढ़ाई का क्षेत्र, अपनी पसंद और आगे के करियर का लक्ष्य देखना चाहिए। आईटी और ऑटोमोबाइल में करियर बनाने वालों के लिए जापानी या जर्मन काम की हो सकती है। मनोरंजन, डिजिटल कंटेंट, सीरियल और अनुवाद में दिलचस्पी रखने वालों के लिए कोरियन एक विकल्प हो सकती है। कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों को फ्रेंच सीखने से फायदा हो सकता है। उनकी सलाह थी कि सिर्फ इसलिए कोई भाषा न सीखें कि उसकी मांग है, बल्कि अपनी पसंद और पेशे की जरूरत के हिसाब से चुनें।
जापानी भाषा का ज्ञान परखने के लिए Japanese Language Proficiency Test (JLPT) अहम मानी जाती है। इसमें पांच स्तर होते हैं। N5 प्राथमिक स्तर है, N4 प्राथमिक ज्ञान का अगला स्तर, N3 मध्यम स्तर, N2 प्रगत स्तर और N1 सबसे ज्यादा प्रगत स्तर है। प्रियंका ने कहा कि विद्यार्थी अपनी क्षमता और करियर के लक्ष्य के हिसाब से पढ़ाई करें, और जापानी सीखने के लिए लगातार अभ्यास और असल में भाषा का इस्तेमाल जरूरी है।
जापानी एनिमे और मनोरंजन की दुनिया की वजह से कई नौजवान यह भाषा सीखने को प्रेरित होते हैं। पर प्रियंका ने बताया कि एनिमे की भाषा और काम की दुनिया में बोली जाने वाली जापानी में फर्क है। एनिमे में अक्सर बोलचाल के शब्द, बोलने के खास अंदाज और छोटे वाक्य होते हैं, जबकि दफ्तर के कामकाज में आदर वाली और औपचारिक भाषा को अहमियत मिलती है। जापानी में 'केइगो' नाम की आदर वाली शैली इस्तेमाल होती है। एनिमे देखकर शब्दभंडार बढ़ाने में मदद मिल सकती है, लेकिन कारोबारी बातचीत के लिए मानक भाषा और औपचारिक बोलचाल की पढ़ाई भी जरूरी है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल से अनुवाद के क्षेत्र में बड़े बदलाव आ रहे हैं। पहले किसी दस्तावेज के अनुवाद में जितना वक्त लगता था, वह अब AI टूल्स से कम हो गया है। प्रियंका ने बताया कि वे खुद भी काम में AI का इस्तेमाल करती हैं और माना कि इससे अनुवाद में रफ्तार और सहूलियत मिलती है। उनके मुताबिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने के साथ भाषा के ज्ञान को दूसरे पेशेवर हुनर के साथ जोड़ना अहम हो सकता है। उन्होंने सलाह दी कि सिर्फ अनुवाद तक सीमित न रहें, अपने मूल क्षेत्र के हुनर के साथ विदेशी भाषा का ज्ञान भी बढ़ाएं।
कोई भी विदेशी भाषा सीखते वक्त निरंतरता बहुत जरूरी है। रोजमर्रा में मराठी, हिंदी या अंग्रेजी बोली जाती है, इसलिए वे आसानी से याद रहती हैं। लेकिन जापानी जैसी विदेशी भाषा का नियमित इस्तेमाल न हो तो सीखे हुए शब्द और वाक्य की बनावट भूल जाने का डर रहता है। इसलिए पढ़ाई पूरी होने के बाद भी पढ़ने, सुनने, बातचीत करने और असल काम के जरिए भाषा से जुड़े रहना जरूरी है, ऐसा प्रियंका ने बताया।
नौजवानों के लिए प्रियंका का संदेश यह रहा कि विदेशी भाषा सीखने के लिए उस देश में जाना जरूरी नहीं है। भारत में रहकर भी उस भाषा के सहारे करियर के मौके तलाशे जा सकते हैं, और विदेशी कंपनियों के साथ काम करने के विकल्प भी मिल सकते हैं। अपनी पढ़ाई, हुनर और पसंद से मेल खाने वाली भाषा चुनी जाए तो करियर की नई राहें खुल सकती हैं। बारहवीं की छुट्टियों में यूं ही लिया गया एक फैसला आगे जिंदगी को अलग दिशा दे सकता है, यह उनके सफर से साफ दिखता है।