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00:48 IST

स्कूल की घंटी और 9 से 5 की नौकरी, यह रुटीन आया कहां से

स्कूल की घंटी और 9 से 5 की नौकरी, यह रुटीन आया कहां से
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाना, क्लास में बैठना, परीक्षा देकर डिग्री लेना और उसके बाद 9 से 5 की नौकरी करना, यह आज हर आदमी की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। हमें लगता है कि दुनिया हमेशा से ऐसे ही चलती आई है, लेकिन इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो सच्चाई इससे बिल्कुल उलटी निकलती है। हजारों साल पहले इंसानी समाज में न तो आज जैसी बाकायदा स्कूल हुआ करते थे और न ही ऑफिस की कोई फिक्स टाइमिंग होती थी।

जिस रुटीन को आज हम एकदम नैचुरल या आम बात मान बैठे हैं, वह असल में इंसान के सामाजिक, आर्थिक और औद्योगिक विकास का नतीजा है। पुराने जमाने के गुरुकुल और हाथ से काम सीखने की परंपरा से शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर कैसे फैक्टरी, नियम-कायदे, सर्टिफिकेट और मॉडर्न कॉर्पोरेट नौकरियों की एक तय सीढ़ी में बदल गया, यह कहानी काफी दिलचस्प है और सोचने पर मजबूर भी करती है।

शुरुआती दौर में पढ़ाई और हुनर सीखने का तरीका आज जैसी चार दीवारों वाली क्लास या फिक्स सिलेबस से बंधा नहीं था। पुराने समय में बच्चे ज्यादातर अपने परिवार, समाज के किसी समूह, धार्मिक जगह या किसी माहिर उस्ताद के साथ रहकर काम सीखते थे। उस दौर में खेती, पशुपालन, हस्तकला और कारोबार से जुड़े हुनर को ज्यादा तवज्जो दी जाती थी। समाज में पढ़ना-लिखना सिखाने वाले कुछ चुनिंदा केंद्र जरूर थे, लेकिन वहां तक पहुंच सिर्फ मुट्ठी भर लोगों तक सीमित थी। आम जनता के लिए जिंदगी का तजुर्बा और बड़ों से सीखा हुआ काम ही सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली मानी जाती थी।

आज अच्छी नौकरी या करियर के लिए कॉम्पिटिटिव एग्जाम देना आम बात लगती है, मगर इसकी नींव पुराने चीन में पड़ी थी। सुई राजवंश के दौर में काबिल लोगों को सरकारी कामकाज में लाने के लिए एक खास परीक्षा प्रणाली शुरू की गई थी। बाद में तांग और सोंग राजवंशों ने इस शाही परीक्षा व्यवस्था को और पारदर्शी और मजबूत बनाया। इसका मकसद यह था कि पद विरासत से नहीं, बल्कि काबिलियत के आधार पर मिले। फिर भी उस दौर में सामाजिक असमानता की वजह से इसका फायदा चंद लोगों तक ही पहुंचा, और आखिरकार 1905 में यह पुरानी व्यवस्था आधिकारिक तौर पर खत्म कर दी गई।

18वीं और 19वीं सदी में आई औद्योगिक क्रांति ने इंसानी इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव लाने का काम किया। बड़े पैमाने पर शुरू हुई फैक्टरियों और मशीनों को चलाने के लिए ऐसे मजदूर और कर्मचारी चाहिए थे जो कम से कम पढ़ना-लिखना, गिनना जानते हों और दिए गए निर्देश मान सकें। इसी जरूरत ने बच्चों को एक साथ पढ़ाने और अनुशासन सिखाने वाली स्कूल व्यवस्था को जन्म दिया। सरकारों ने अपना कामकाज और अर्थव्यवस्था संभालने के लिए सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का विस्तार किया। यानी रेगुलर क्लास, टाइमटेबल, घंटी बजना और परीक्षाओं का यह पूरा ढांचा औद्योगिक दौर की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही तैयार हुआ।

औद्योगिक क्रांति से पहले ज्यादातर लोग अपने खेत या घर में ही छोटे स्तर पर काम करते थे, जहां वक्त की कोई सख्त पाबंदी नहीं होती थी। लेकिन फैक्टरी के दौर में लोगों को एक तय जगह जाकर तय वक्त तक मजदूरी करने वाली व्यवस्था में धकेल दिया गया। शुरुआत में मजदूरों को 12 से 16 घंटे तक कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी, जिसका उनकी सेहत और हक दोनों पर बुरा असर पड़ा। लंबे मजदूर आंदोलनों के बाद काम के घंटे तय करने की मांग उठी। साल 1919 में इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) ने अपनी पहली नीति बनाकर उद्योगों में रोजाना 8 घंटे और हफ्ते में 48 घंटे काम करने के सिद्धांत को मंजूरी दी, जो आज 9 से 5 की नौकरी का स्टैंडर्ड बन चुका है।

वक्त के साथ पढ़ाई और नौकरी का रिश्ता और गहरा होता गया। स्कूल ने बुनियादी शिक्षा दी, कॉलेज ने हुनर सिखाया, और इसके बाद मिलने वाली डिग्री नौकरी और कमाई का जरिया बन गई। लेकिन यह पूरा सिलसिला कोई नैचुरल नियम नहीं, बल्कि इंसान की बनाई हुई एक सामाजिक सीढ़ी है। आज टेक्नोलॉजी और इंटरनेट की तेज रफ्तार वाले दौर में यह पुराना ढांचा फिर से बदल रहा है। अब कंपनियां सिर्फ कागज की डिग्री से ज्यादा व्यावहारिक हुनर, अनुभव और नई चीजें सीखने की क्षमता को तवज्जो दे रही हैं। साथ ही वर्क फ्रॉम होम, पार्ट-टाइम काम और फ्लेक्सिबल टाइमिंग जैसे नए तरीकों ने 9 से 5 की इस पुरानी चौखट को चुनौती देना शुरू कर दिया है।

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