गुरूवार, 29 अक्टूबर 2026

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इस्रायल पुलिस ने लिकुड के 'वोटचोरी' के आरोपों को नकारा, कहा- कोई सबूत नहीं मिला

इस्रायल पुलिस ने लिकुड के 'वोटचोरी' के आरोपों को नकारा, कहा- कोई सबूत नहीं मिला तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
दुनिया PT24 टीम

इस्रायली पुलिस ने गुरुवार को कहा कि अरब पार्टियों पर लिकुड के वोटचोरी और गड़बड़ी के आरोपों को साबित करने वाला कोई सबूत उसके हाथ नहीं लगा।

इस्रायल में मंगलवार को हुए आम चुनाव के बाद सियासी माहौल गरमाया हुआ है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ताधारी लिकुड पार्टी ने अरब पार्टियों पर "चुनाव चोरी" और गंभीर गड़बड़ियों के आरोप लगाए थे। इस्रायली पुलिस ने गुरुवार को इन सभी आरोपों को साफ तौर पर खारिज कर दिया। पुलिस के हवाले से बताया गया है कि लिकुड के दावों की पुष्टि करने वाली कोई ठोस जांच या आपराधिक सबूत मौजूद नहीं है। ऐसे वक्त में, जब वोटों की गिनती चल रही है और सरकार बनाने को लेकर पेच फंसा है, नेतन्याहू के खेमे के लिए यह नैतिक और राजनीतिक दोनों स्तर पर बड़ा झटका माना जा रहा है।

यह पूरा मामला सियासी समीकरणों के लिहाज से बेहद नाजुक माना जा रहा है। चुनाव में कांटे की टक्कर रही और किसी भी गुट को साफ बहुमत नहीं मिला। इसी बीच लिकुड ने चुनाव की पारदर्शिता पर ही सवाल उठा दिए थे। पार्टी का दावा था कि उसने सैकड़ों गवाहों के बयान और शिकायतें पुलिस को सौंपी हैं। इसके बावजूद पुलिस और केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) ने फौरन कदम उठाते हुए कहा कि इन आरोपों में दम नहीं है और चुनाव की प्रक्रिया निष्पक्ष रही।

जेरुसलम पोस्ट और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने इस बारे में एक खास बयान जारी किया। बयान में कहा गया कि वोटिंग के दिन चुनाव की निष्पक्षता से जुड़ी कुछ मामूली और असामान्य घटनाओं की शिकायतें आई थीं, लेकिन पिछले चुनावों के मुकाबले उनकी संख्या काफी कम थी। पुलिस ने साफ किया कि लिकुड ने बड़े पैमाने पर गड़बड़ी और "वोटचोरी" के जो दावे किए हैं, उनका समर्थन करने वाली कोई जांच या खुफिया जानकारी उसे नहीं मिली है।

उधर इस्रायल की केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) के अधिकारियों ने भी लिकुड के दावों को खारिज किया। CEC का कहना है कि जब मतदान का प्रतिशत ऊंचा रहा हो, तब इस तरह के गंभीर आरोप लगाना ठीक नहीं है। आयोग ने बताया कि उसने मानक जांच प्रक्रिया अपनाई थी, फिर भी चुनाव की बुनियादी वैधता को चुनौती देने लायक कोई वजह अब तक सामने नहीं आई है।

इससे पहले प्रधानमंत्री नेतन्याहू और उनकी लिकुड पार्टी ने नतीजों पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सीधे अरब पार्टियों पर हमला बोला था। पार्टी के आधिकारिक बयान में कहा गया था, "इस्रायल के चुनाव अरब पार्टियों ने हाईजैक कर लिए हैं। ये पार्टियां आतंकवाद का समर्थन करती हैं और यहूदी राष्ट्र का वजूद खत्म करना चाहती हैं। उन्होंने रिश्वतखोरी, धमकियां, हिंसा, मतपत्रों की जालसाजी और मतदाताओं को संगठित करने के लिए गैरकानूनी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल जैसे गंभीर अपराध किए हैं।"

नेतन्याहू की पार्टी ने मांग की थी कि इस मामले की गहरी जांच शिन बेट (Shin Bet) खुफिया एजेंसी, पुलिस और चुनाव आयोग के जरिए कराई जाए। लेकिन पुलिस की जांच में इन दावों का खंडन होने के बाद नेतन्याहू की इस रणनीति पर विपक्षी पार्टियां कड़े शब्दों में आलोचना कर रही हैं।

इस बार अरब समुदाय ने रिकॉर्ड तादाद में हिस्सा लिया और वोट डाले। सरकारी गिनती के आखिरी दौर में, जब करीब 91 फीसदी से ज्यादा गिनती पूरी हो चुकी थी, अरब पार्टियों के गठबंधन को 19 सीटें मिलती दिखीं। पिछले चुनाव में अरब पार्टियां सिर्फ 10 सीटों तक सिमट गई थीं, इसलिए उनका यह प्रदर्शन ऐतिहासिक माना जा रहा है।

मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक 129 सदस्यों वाली क्नेसेट (संसद) में नेतन्याहू की अगुवाई वाले दक्षिणपंथी गुट को 53 सीटें मिली हैं, जबकि मुख्य विपक्षी गुट ने 48 सीटें जीती हैं। इस्रायल में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का बहुमत चाहिए। लिकुड सबसे बड़ी पार्टी तो बनी है, लेकिन बहुमत से अब भी 9 सीट दूर है। ऐसे में 19 सीटें जीतने वाली अरब पार्टियां 'किंगमेकर' की भूमिका में आ गई हैं। हालांकि नेतन्याहू और विपक्ष, दोनों ने सत्ता बनाने के लिए अरब पार्टियों के साथ सीधे गठबंधन से इनकार कर दिया है, इसलिए इस्रायल में एक बार फिर सियासी गतिरोध बनता दिख रहा है।

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