गोंदिया: दिव्यांग की रकम 8 साल रोकी, वारंट के बाद SBI मैनेजर हाजिर, 6,86,568 रुपये सौंपे
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रेल हादसे में एक हाथ गंवा चुके पवन तिवारी का पैसा भारतीय स्टेट बैंक की गोंदिया शाखा ने सालों तक रोके रखा। गैर-जमानती वारंट जारी होने पर चीफ मैनेजर उपभोक्ता आयोग में पेश हुए।
गोंदिया में उपभोक्ता आयोग के सख्त रुख के आगे भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को झुकना पड़ा। एक दिव्यांग के हक की रकम बैंक ने सालों तक अपने पास रोके रखी थी। उपभोक्ता संरक्षण कानून की धारा 72 के तहत गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी हुआ तो SBI गोंदिया शाखा के चीफ मैनेजर अरविंद कुमार 30 अक्टूबर, शुक्रवार को आयोग के सामने हाजिर हुए।
आदेश न मानने पर आयोग ने सख्ती दिखाई। उसने मैनेजर को 15,000 रुपये के व्यक्तिगत मुचलके (PR Bond) पर छोड़ा। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को होगी। उस दिन मैनेजर को नियमित जमानत पेश करनी होगी और उनका प्ली-रिकॉर्ड भी दर्ज किया जाएगा।
कोर्ट की सख्ती का असर उसी दिन दिखा। बैंक ने पीड़ित पवन तिवारी को 6,86,568 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट या चेक आयोग के सामने सौंप दिया। पवन तिवारी ने उसे स्वीकार कर लिया।
मामला गोंदिया के गणेश नगर के रहने वाले पवन श्रावण तिवारी का है। 3 जनवरी 2015 को एक ट्रेन हादसे में उनका एक हाथ हमेशा के लिए चला गया था। रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल (RCT), नागपुर ने 2017 में उन्हें 4.80 लाख रुपये का मुआवजा मंजूर किया। इसमें से 3 लाख रुपये की FD 5 साल के लिए बनाने का आदेश था।
मध्य रेलवे ने जनवरी 2018 में ही 3 लाख रुपये का चेक SBI की गोंदिया शाखा को भेज दिया था। लेकिन बैंक ने FD बनाई ही नहीं। 2022 में बैंक ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि चेक भुनाए जाने का कोई रिकॉर्ड नहीं है।
पवन तिवारी की शिकायत (क्र. 22/102) पर जिला उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग ने 16 जनवरी 2025 को फैसला सुनाया। आयोग के अध्यक्ष वैशाली गजभिये हैं और सदस्य अतुल आलसी व संजय जोशी हैं। आयोग ने बैंक और रेलवे से कहा कि 45 दिनों के भीतर 2018 से ब्याज समेत FD बनाई जाए। साथ ही 25 हजार रुपये मानसिक संताप के और 10 हजार रुपये कानूनी खर्च के देने को कहा गया।
बार-बार आवेदन देने पर भी बैंक टालमटोल करता रहा। इसके बाद जून 2025 में पीड़ित ने धारा 72 के तहत निष्पादन याचिका (EA 19/2025) दाखिल की।
सुनवाई में 13 अगस्त 2026 को मध्य रेलवे ने SBI की मुंबई मुख्य शाखा का एक पत्र पेश किया। उससे बैंक की बात गलत निकली, क्योंकि पत्र के मुताबिक चेक 2018 में ही क्लियर होकर गोंदिया शाखा के खाते में जमा हो चुका था। आदेश की खुली अवहेलना देखकर आयोग ने शाखा मैनेजर के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। वारंट की तामीली के डर से मैनेजर शुक्रवार को अपने वकील के साथ आयोग में पेश हुए।
30 अक्टूबर की सुनवाई में मैनेजर की ओर से एडवोकेट पराग तिवारी ने वकालतनामा और व्यक्तिगत मुचलका पेश किया। आयोग ने उसे मंजूर करके 15,000 रुपये के बॉन्ड पर रिहाई दी। बैंक का दिया 6,86,568 रुपये का धनादेश पवन तिवारी को दिलवाया गया।
पीड़ित पक्ष अब RTI के जरिए यह पता लगाने में जुटा है कि 8 साल तक दिव्यांग का पैसा दबाने के पीछे कौन सा बैंक अधिकारी जिम्मेदार था। पीड़ित की ओर से आयोग में पैरवी एडवोकेट संदीप खाटेड और एडवोकेट अनिता दास ने की।
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