गोकुळ में सरकार पांच विशेषज्ञ संचालक नियुक्त करेगी, मुश्रीफ ने बताई वजह
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राज्य मंत्रिमंडल ने गोकुळ पर पांच सरकार-नियुक्त विशेषज्ञ संचालकों को मंजूरी दी, जिन्हें वोट देने का अधिकार भी होगा। हसन मुश्रीफ ने फैसले पर सफाई दी।
कोल्हापुर जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ, यानी गोकुळ, के अध्यक्ष पद को लेकर चल रही खींचतान में एक और बड़ा मोड़ आया है। राज्य सरकार ने गोकुळ पर पांच विशेषज्ञ संचालक नियुक्त करने का फैसला किया है। आज हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में इस फैसले को मंजूरी मिल गई। खास बात यह है कि इन पांचों सदस्यों को वोट देने का अधिकार भी दिया गया है। इसी वजह से गोकुळ के सत्ता समीकरण बदलने की संभावना बन गई है।
हाल ही में हुए गोकुळ के चुनाव में सतेज पाटील की अगुवाई वाली राजर्षी शाहू शेतकरी समविचारी आघाडी ने 13 सीटें जीतीं, जबकि महायुति को 12 सीटों पर संतोष करना पड़ा। आघाडी के पास बहुमत होने के बावजूद अध्यक्ष चुनने के लिए जरूरी 14 संचालकों के कोरम का मुद्दा उठा। ऊपर से महायुति के 12 संचालक पहली ही बैठक में नहीं आए, इसलिए अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो सका।
इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने पांच स्वीकृत विशेषज्ञ संचालक नियुक्त करने का फैसला लिया है। इन सदस्यों को वोट का अधिकार मिलने से अध्यक्ष चुनाव का राजनीतिक गणित बदलने की चर्चा शुरू हो गई है।
गोकुळ के अध्यक्ष चुनाव पर बोलते हुए हसन मुश्रीफ ने कहा, "राज्य सरकार ने यह कानून लाया है, फिर भी मेरा बेटा हो या कोई और, विशेषज्ञ संचालक नहीं बनेगा। मुझे लगता है कि सरकार ऐसे ही लोगों को नियुक्त करेगी, जिनका किसी भी पार्टी से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।"
मुश्रीफ ने बताया कि पश्चिम महाराष्ट्र में गोकुळ दूध के नाम से मशहूर कोल्हापुर जिला दूध उत्पादक संघ का चुनाव कुछ दिन पहले हुआ था। उनके मुताबिक इसमें कांग्रेस प्रणीत राजर्षी शाहू समविचारी पैनल को 13 और महायुति को 12 सीटें मिलीं। मगर संस्था के उपनियमों में कोरम 14 का है। मुश्रीफ ने कहा कि कोरम पूरा हुए बिना न अध्यक्ष का चुनाव हो सकता है और न बैठक, और कोरम की शर्त पूरी करना कानूनन जरूरी है।
उन्होंने बताया कि पहली बैठक में महायुति के 12 सदस्य गैरहाजिर रहे, इसलिए कोरम के अभाव में बैठक पूरी नहीं हो पाई। 10 तारीख को होने वाली अगली बैठक में भी यही हालत रहती। मुश्रीफ के अनुसार सहकार कानून के नियमों में अगर अध्यक्ष चुनाव की बैठक दो-तीन बार स्थगित हो जाए, तो संस्था पर प्रशासक (Administrator) नियुक्त करना पड़ता है और फिर से चुनाव कराने पड़ते हैं।
मुश्रीफ ने कहा, "हम 12 सदस्य विपक्ष में हैं। हमें विपक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। जनता ने हमें यह संदेश नहीं दिया है कि हम बैठक में जाकर उनका (कांग्रेस का) चेयरमैन बनवाएं। इसलिए हम बैठक में गैरहाजिर रहे। गोकुळ के उपनियमों के हिसाब से 14 सदस्यों का कोरम पूरा हुए बिना अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो सकता। अगर यह बैठक दो-तीन बार रद्द होती, तो कानून के मुताबिक गोकुळ पर प्रशासक नियुक्त करना पड़ता। 5 से साढ़े पांच लाख दूध उत्पादक किसानों का नुकसान टालने और प्रशासक से बचकर लोकतंत्र कायम रखने के लिए सरकार ने यह रास्ता निकाला।"
मुश्रीफ ने यह भी कहा कि यह कानून आम संस्थाओं पर लागू नहीं होगा। उनके मुताबिक जिन संस्थाओं का सालाना टर्नओवर 500 करोड़ रुपये से ज्यादा है, जिन्हें सरकारी जमीन, अनुदान या शेयर पूंजी मिली है और जो फेडरल स्वरूप की हैं, राज्य की ऐसी सिर्फ 3 संस्थाओं पर ही यह कानून लागू होगा। मुश्रीफ ने विरोधियों पर तंज कसते हुए कहा कि वे बिना किसी अध्ययन और जानकारी के, सिर्फ गलतफहमी की वजह से सरकार पर बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं।
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