गडचिरोली में पत्रकारों की कार्यशाला, माओवादमुक्त भारत के लिए तालमेल पर जोर
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गडचिरोली पुलिस और पत्र सूचना कार्यालय नागपुर की कार्यशाला में वक्ताओं ने कहा कि आपसी तालमेल और सकारात्मक संवाद से माओवादमुक्त भारत मुमकिन है।
गडचिरोली पुलिस और केंद्र सरकार के पत्र सूचना कार्यालय नागपुर ने बुधवार को मिलकर पत्रकारों के लिए एक कार्यशाला की। विषय था "माओवादमुक्त भारत"। वक्ताओं ने कहा कि आपसी तालमेल और सकारात्मक संवाद से यह मुमकिन है।
कार्यशाला पुलिस मुख्यालय के एकलव्य सभागार में हुई। विशेष पुलिस महानिरीक्षक (नक्सलविरोधी अभियान) संदीप पाटील नागपुर से ऑनलाइन जुड़े। पुलिस उपमहानिरीक्षक (गडचिरोली परिक्षेत्र) योगेश कुमार और पुलिस अधीक्षक एम. रमेश के साथ कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी मौजूद थे।
इनके अलावा माओवाद विषय के जानकार, वरिष्ठ लेखक और पॉलिसी एनालिस्ट पी.व्ही. रामना, वरिष्ठ पत्रकार कार्तिक लोखंडे, अपर पुलिस अधीक्षक (अभियान) कार्तिक मधीरा और अपर पुलिस अधीक्षक (प्रशासन) गोकुल राज जी. मौजूद रहे। पत्र सूचना कार्यालय नागपुर की तरफ से सौरभ खेकडे और देवप्रकाश दुबे भी आए।
कार्यशाला में बताया गया कि माओवाद कैसे फैला और उसे खत्म करने के लिए अब तक क्या-क्या कोशिशें हुईं। माओवाद की शुरुआत, फैलाव, मौजूदा हालात, माओवादियों के काम करने का तरीका और उनकी विचारधारा पर बात हुई। माओवादविरोधी अभियान के दौरान आने वाली चुनौतियां भी गिनाई गईं। मुख्य वक्ताओं ने अपने अनुभव और अध्ययन से निकले विचार रखे।
पत्रकार कार्तिक लोखंडे ने सवाल उठाया कि माओवादी खत्म हो गए, पर क्या माओवाद खत्म हुआ। उन्होंने अंदाजा जताया कि बचा हुआ माओवाद विकास के कामों में किस तरह रुकावट डाल सकता है।
संदीप पाटील ने सशस्त्र माओवाद के खात्मे के बाद आगे पुलिस के सामने आने वाली चुनौतियों पर विस्तार से मार्गदर्शन किया। योगेश कुमार और एम. रमेश ने गडचिरोली जिले में माओवादविरोधी लड़ाई का सफर बताया। उन्होंने पुलिस की अपनाई रणनीतियों, सुरक्षा एजेंसियों के योगदान और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी पर रोशनी डाली। विकास की पहल के जरिए माओवाद का असर घटाने की कोशिशों का भी जिक्र किया।
कार्यक्रम में रेखांकित किया गया कि गडचिरोली जिले में माओवाद खत्म हो चुका है। आगे की चुनौतियों से निपटने के लिए पुलिस, सरकार, मीडिया और समाज के अलग-अलग तबकों के बीच तालमेल और सकारात्मक संवाद जरूरी है। इसी सिलसिले में वरिष्ठ अधिकारियों, विशेषज्ञों और पत्रकारों की ओर से माओवादविरोधी अभियान के अनुभवों, कामयाब तरीकों और आने वाली चुनौतियों पर विचार-विमर्श हुआ। पत्रकारों ने सवाल पूछकर चर्चा में हिस्सा लिया।
यह भी कहा गया कि माओवाद की समस्या को सिर्फ कानून-व्यवस्था का मसला मानकर नहीं देखना चाहिए। इसे सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और विकास के नजरिए से भी देखने की जरूरत है।
इस संवाद से पत्रकारों को माओवाद की समस्या की तथ्यपरक जानकारी मिली। नक्सलमुक्त भारत की दिशा में चल रही कोशिशों की पृष्ठभूमि, मौजूदा स्थिति और आगे के रास्ते को विस्तार से जानने का मौका भी मिला। कार्यक्रम में माओवादविरोधी अभियान में अपने प्राणों की आहुति देने वाले 214 शहीद जवानों की स्मृति को श्रद्धांजलि भी दी गई।
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