रविवार, 11 अक्टूबर 2026

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15:13 IST

घटस्थापना में मिट्टी के बर्तन में अनाज क्यों बोते हैं, नौ दिन बाद अंकुरों का क्या करें

शारदीय नवरात्रि की शुरुआत के साथ घर-घर घट बैठाने की तैयारी है। घट के पास बोया जाने वाला अनाज क्यों बोया जाता है, कौन सा अनाज चलता है और नौ दिन बाद अंकुरों का क्या होता है, यहां पूरी बात।

घटस्थापना में मिट्टी के बर्तन में अनाज क्यों बोते हैं, नौ दिन बाद अंकुरों का क्या करें तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

आज से शारदीय नवरात्रि शुरू हो गई है और हर तरफ घट बैठाने की तैयारी चल रही है। घट बैठाते वक्त आपने एक बात जरूर देखी होगी कि मिट्टी की परात में अनाज बोया जाता है और नौ दिन में उस अनाज से हरे अंकुर निकल आते हैं। बहुत से लोगों के मन में सवाल उठता है कि ऐसा क्यों किया जाता है। क्या यह सिर्फ परंपरा है या इसके पीछे कोई मतलब भी है, और आखिर कौन सा अनाज बोना चाहिए।

पहले यह जान लें कि अनाज बोया कैसे जाता है। एक मिट्टी के बर्तन में पहले थोड़ी मिट्टी डाली जाती है, उसके ऊपर अनाज डाला जाता है और फिर ऊपर से मिट्टी डालकर उसे ढक दिया जाता है। रोज सुबह और शाम थोड़ा पानी छिड़का जाता है। दो-तीन दिन में ही छोटे अंकुर फूटने लगते हैं और नौ दिन में अच्छे बढ़ जाते हैं। उत्तर भारत में इसे जवारा कहते हैं।

इसके पीछे दो कारण बताए जाते हैं। पहला कारण धार्मिक है। देवी दुर्गा जन्म देने वाली और सृष्टि रचने वाली देवी हैं। बीज से अंकुर निकलना यानी नया जन्म होना। इसी वजह से घट में अनाज बोना देवी की सृजन शक्ति की पूजा माना जाता है। इन अंकुरों को समृद्धि, भरभराई और अच्छे दिनों का लक्षण समझा जाता है।

दूसरा कारण खेती से जुड़ा है। भारत खेती प्रधान देश है और पुराने जमाने में लोग खेती पर ही जीते थे। नवरात्रि का वक्त खेती के लिए अहम होता है। इसलिए मिट्टी में अनाज बोकर उसे बढ़ते देखना किसान के लिए अपने खेत की याद जैसा है। प्रकृति ने जो अन्न दिया, उसके लिए आभार जताने का यह एक तरीका है।

अब सवाल कि कौन सा अनाज बोएं। इसका कोई एक नियम नहीं है और हर इलाके में अलग तरीका चलता है। सबसे ज्यादा लोग जौ बोते हैं। जौ के अंकुर जल्दी आते हैं और एकदम हरे-भरे दिखते हैं, इसलिए इसे शुभ माना जाता है। गेहूं भी बहुत से लोग बोते हैं, गेहूं को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कुछ घरों में चावल बोया जाता है, क्योंकि चावल पूजा में लगता ही है। कुछ जगह मूंग, चना और तिल जैसी दालें भी बोई जाती हैं। कुछ लोग सात तरह का अनाज बोते हैं, जिसे सप्तधान्य कहते हैं। इसमें गेहूं, जौ, चावल, चना, मूंग, बाजरा और तिल में से कुछ भी लिया जा सकता है। घर में जो आसानी से मिल जाए, वही बो दें।

नौ दिन में अंकुर कितने बढ़े, इससे लोग अंदाजा लगाते हैं। अगर अंकुर हरे-भरे और सीधे बढ़े, तो घर में सुख-शांति रहेगी और फसल अच्छी आएगी, ऐसी श्रद्धा है। हालांकि यह वैज्ञानिक बात नहीं है। मिट्टी अच्छी हो और पानी सही मिले, तो अंकुर अच्छे बढ़ेंगे ही।

आखिरी दिन क्या करना है, यह भी जान लें। दशहरे के दिन या नवरात्रि खत्म होने पर ये अंकुर उखाड़कर देवी को चढ़ाए जाते हैं। कुछ जगह लोग ये अंकुर एक-दूसरे को देकर शुभकामनाएं देते हैं। कुछ लोग इनका विसर्जन करते हैं। आपके घर में जैसी पद्धति है, वैसा करें। एक बात पक्की है कि यह परंपरा सिर्फ धार्मिक नहीं है, यह हमें प्रकृति से भी जोड़ती है।

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