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17:58 IST

शारदीय नवरात्रि में नौ दिन होती है नवदुर्गा की पूजा, जानिए तरीका और मायने

नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा कैसे होती है, हर दिन किस रूप की पूजा होती है और इन रीतियों को सेहत के नजरिए से कैसे देखा जा सकता है।

शारदीय नवरात्रि में नौ दिन होती है नवदुर्गा की पूजा, जानिए तरीका और मायने तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

शारदीय नवरात्रि को हिंदू धर्म का अहम त्योहार माना जाता है। इन नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों, यानी नवदुर्गा, की पूजा की जाती है। इस दौरान उपवास, पूजा, मंत्रजप, ध्यान, सात्त्विक खाना और जागरण जैसी कई परंपराएं निभाई जाती हैं। ये रीतियां आस्था से जुड़ी हैं, लेकिन इनमें से कुछ बातों को सेहत, रोज की दिनचर्या और मन की शांति के नजरिए से भी देखा जा सकता है।

पहले दिन घर का देवघर या पूजा की जगह साफ करके घटस्थापना की जाती है। कलश बैठाकर उसमें पानी, सुपारी, सिक्का और दूसरी पूजा सामग्री रखी जाती है। कलश पर नारियल और आम के पत्ते रखने की परंपरा है। इसके बाद नौ दिन तक देवी के अलग अलग रूपों की पूजा होती है। देवी के सामने दीया जलाकर फूल, अक्षता, कुमकुम, हल्दी, नैवेद्य और फल चढ़ाए जाते हैं। परिवार की परंपरा के मुताबिक आरती, मंत्रजप और स्तोत्र पाठ भी किया जाता है। साफ सफाई, सात्त्विक माहौल और श्रद्धा के साथ उपासना पर खास जोर दिया जाता है।

पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा होती है। हिमालय की बेटी होने से देवी को शैलपुत्री कहा जाता है और यह रूप स्थिरता और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन नवरात्रि की शुरुआत में संकल्प लिया जाता है। दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है, जिन्हें तपस्या, संयम और साधना का प्रतीक माना जाता है। तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा होती है, जिनका रूप शौर्य और रक्षा का प्रतीक माना गया है।

चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा की जाती है। धार्मिक कथाओं में उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति का स्वरूप बताया गया है। पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा होती है। भगवान कार्तिकेय, यानी स्कंद, को गोद में लिए यह रूप ममता और करुणा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि परिवार की सुख और समृद्धि के लिए देवी की आराधना की जाती है। छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा होती है, जिन्हें शक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है।

सातवें दिन माता कालरात्रि की पूजा होती है। देवी का यह उग्र रूप नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाला माना जाता है। आठवें दिन, यानी अष्टमी को, माता महागौरी की पूजा होती है, जो पवित्रता, शांति और करुणा का प्रतीक मानी जाती हैं। कई परिवारों में अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन की परंपरा है, मगर यह तरीका इलाके और परिवार की परंपरा के हिसाब से बदल सकता है। नौवें दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा होती है। मान्यता है कि वे भक्तों को सिद्धि और आध्यात्मिक तरक्की देती हैं। इस दिन खास पूजा, आरती और मंत्रजप के साथ नवरात्र का व्रत पूरा किया जाता है।

धार्मिक मान्यता के मुताबिक नौ रूपों की पूजा आदिशक्ति के अलग अलग स्वरूपों की आराधना है। इस दौरान शक्ति की उपासना करके मन के नकारात्मक विचार दूर करने और सकारात्मकता की ओर बढ़ने का संदेश दिया जाता है। इसी वजह से यह समय आत्मचिंतन, संयम और भक्ति के लिए अहम माना जाता है।

नवरात्रि की धार्मिक रीतियों को सीधे तौर पर इलाज या बीमारी से बचाव का तरीका नहीं माना जा सकता। फिर भी कुछ रीतियों का सेहत और मन से अप्रत्यक्ष रिश्ता हो सकता है। उपवास में कई लोग तला हुआ, बहुत तीखा और भारी खाना छोड़कर फल, दूध, कंदमूल या हल्का खाना लेते हैं, जिससे रोज के खाने की मात्रा और स्वरूप बदल जाता है। हालांकि उपवास हर किसी के लिए ठीक हो, यह जरूरी नहीं। मंत्रजप, ध्यान और प्रार्थना से मन शांत रखने और ध्यान लगाने में मदद मिल सकती है। नियमित पूजा रोज की दिनचर्या में एक तय वक्त देने का जरिया बन सकती है। घर की सफाई, पूजा से पहले नहाना, साफ कपड़े पहनना और पूजा की जगह साफ रखना निजी सफाई की आदत को भी बढ़ावा देते हैं।

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