चांद पर परमाणु रिएक्टर लगाने की होड़ में अमेरिका, रूस और चीन
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
अमेरिका, रूस और चीन चांद पर स्थायी बेस के लिए रिएक्टर बनाने की तैयारी में हैं।
अमेरिका, रूस और चीन के बीच अब चांद पर परमाणु रिएक्टर लगाने की नई और कड़ी होड़ शुरू हो गई है। तीनों देश चांद पर अपने स्थायी बेस बनाना चाहते हैं, जहां वैज्ञानिक लंबे वक्त तक रहकर रिसर्च कर सकें। ऐसे बेस के लिए बिना रुके और सुरक्षित बिजली चाहिए, और वह सिर्फ परमाणु रिएक्टर से मिल सकती है। इसी वजह से इन प्रोजेक्ट्स को सबसे ऊपर रखा जा रहा है। इस दौड़ के पीछे सिर्फ विज्ञान की तरक्की नहीं, आगे के भू-राजनीतिक और आर्थिक दबदबे का मसला भी बताया गया है।
सवाल उठता है कि सोलर पैनल से काम क्यों नहीं चलता। चांद की सतह के एक हिस्से में करीब दो हफ्ते, यानी 14 दिन, धूप पहुंचती ही नहीं। इन 14 दिनों में सोलर पैनल किसी काम के नहीं रहते। बैटरी से बिजली देना बहुत महंगा और मुश्किल पड़ता है। पृथ्वी से डीजल या दूसरा ईंधन अंतरिक्ष में ले जाना भी करोड़ों रुपये का सौदा है।
बैंगोर यूनिवर्सिटी के न्यूक्लियर फ्यूचर्स इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर साइमन मिडलबर्ग के मुताबिक चांद पर आगे बनने वाले इंसानी बेस को लगातार बिजली की जरूरत होगी, और यह जरूरत सिर्फ परमाणु ऊर्जा पूरी कर सकती है। उनका कहना है कि चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास गहरे गड्ढों (क्रेटर्स) में छिपी बर्फ को खोजने और उसे खनिजों में बदलने के लिए कम से कम तीन से चार रिएक्टर लग सकते हैं।
रिएक्टर लगाने की एक बड़ी वजह वहां छिपे कीमती संसाधन भी हैं। दक्षिणी ध्रुव के कुछ हिस्सों में लाखों साल से धूप नहीं पहुंची, इसलिए वहां पानी की बर्फ होने की पूरी संभावना है। वैज्ञानिक इस बर्फ से पीने का पानी, सांस के लिए ऑक्सीजन और रॉकेट का ईंधन बनाना चाहते हैं। चांद की मिट्टी में एल्युमिनियम, टाइटेनियम और सिलिकॉन जैसे कीमती खनिजों का बड़ा भंडार भी है, जो आगे सैटेलाइट बनाने और नए मिशनों के काम आएंगे।
नासा ने जनवरी में ही "लुनार रिएक्टर-1" बनाने का ऐलान किया है। उसका लक्ष्य इसे 2023 के आखिर तक पूरा करने का है। यह रिएक्टर करीब 20 किलोवॉट बिजली बनाएगा और अगले पांच साल बिना किसी मरम्मत के अंतरिक्ष में चल सकेगा। इसका वजन 6,000 किलोग्राम से कम रखने की योजना है, ताकि इसे आसानी से स्पेसक्राफ्ट में ले जाया जा सके।
उधर रूस, चीन के साथ मिलकर "सेलेना" (Selena) नाम के खास रिएक्टर पर काम कर रहा है। इसकी क्षमता 10 किलोवॉट होगी और यह बिना देखभाल के पूरे 10 साल अंतरिक्ष में टिक सकेगा। चीन की अगुवाई वाले चांद के बेस को बिजली देने के लिए रूस का लक्ष्य इसे 2036 तक तैयार करने का है। इसका वजन अंदाजन 1,100 से 1,300 किलोग्राम के बीच हो सकता है।
अंतरिक्ष में रिएक्टर भेजने का विचार नया नहीं है। शीतयुद्ध (Cold War) के दौरान सोवियत संघ ने 1960 के दशक के आखिरी सालों से 1980 के दशक तक 30 से ज्यादा छोटे रिएक्टर पृथ्वी की कक्षा में भेजे थे। इस तकनीक से जासूसी सैटेलाइट्स को बिजली दी जाती थी। अमेरिका भी पिछले 70 साल में अंतरिक्ष के परमाणु कार्यक्रमों पर करीब 20 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। फिर भी 1965 के एक प्रयोग के बाद उसे अंतरिक्ष में रिएक्टर भेजने में पूरी कामयाबी नहीं मिली, क्योंकि उस प्रयोग में बिजली का एक पुर्जा खराब होने से रिएक्टर सिर्फ 43 दिन में बंद हो गया था।
खतरे भी हैं। रिएक्टर चालू करने से पहले उसके यूरेनियम से ज्यादा खतरा नहीं होता, लेकिन एक बार चालू होने के बाद रेडियोधर्मी हादसे का जोखिम बढ़ जाता है। 1978 में सोवियत संघ का रिएक्टर वाला "कॉसमॉस-954" (Cosmos-954) सैटेलाइट पृथ्वी पर गिरा था और कनाडा में काफी रेडियोधर्मी कचरा फैल गया था। हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक चांद पर ऐसा हादसा हुआ तो उसका असर एक सीमित इलाके तक ही रहेगा।
आखिर में सवाल है कि चांद पर हक किसका होगा। 1967 की "बाह्य अंतरिक्ष संधि" (Outer Space Treaty) के तहत दुनिया के किसी भी देश का चांद या उसके किसी हिस्से पर कानूनी मालिकाना हक नहीं होगा, और कोई देश वहां अपना अधिकार नहीं जता सकता। संधि में यह भी लिखा है कि वहां भेजे गए उपकरणों और सुविधाओं का मालिकाना हक उसी देश के पास रहेगा। संधि अंतरिक्ष में परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल पर सीधी रोक नहीं लगाती, पर शर्त है कि इस्तेमाल सिर्फ शांतिपूर्ण मकसद के लिए हो और अंतरिक्ष के माहौल को कोई नुकसान न पहुंचे। यानी अमेरिका, रूस और चीन कानूनी तरीके से चांद पर रिएक्टर लगाकर अपनी रिसर्च और खुदाई कर सकते हैं।
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