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19:52 IST

अधूरी चाहत ने थमाई कलम, लाखों दिलों की आवाज बने निदा फाजली

सोमवार को निदा फाजली की जयंती है। सरल शब्दों में लिखी उनकी शायरी और फिल्मी गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं।

अधूरी चाहत ने थमाई कलम, लाखों दिलों की आवाज बने निदा फाजली तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

सोमवार को मशहूर शायर निदा फाजली की जयंती है। उन्होंने आसान शब्दों में शायरी लिखी और कई फिल्मों के लिए गीत भी लिखे।

1999 में आई आमिर खान और सोनाली बेंद्रे की फिल्म 'सरफरोश' आपको याद होगी। फिल्म अपनी एक्टिंग के साथ-साथ गानों की वजह से भी सुपरहिट रही थी। उसकी शायरी 'होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है' आज भी लाखों नौजवानों के दिल में बसी हुई है। इसके बोल हिंदी और उर्दू के साहित्यकार, मशहूर शायर निदा फाजली ने लिखे थे।

उनका एक और शेर है, 'कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीन तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता'। इसका मतलब यह है कि इस दुनिया में किसी को भी सब कुछ नहीं मिलता। यह शायरी उनके अपने मन का दुख बयान करती है। आम आदमी की जिंदगी, उसका संघर्ष, रिश्ते, प्यार और इंसानियत, इन सबको उन्होंने इतने सीधे शब्दों में कहा कि उनकी शायरी आज भी लोगों की जुबान पर है।

निदा फाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था। उनका असली नाम मुक्तदा हसन था। बचपन मध्य प्रदेश के ग्वालियर में बीता और पढ़ाई भी वहीं हुई। उनके पिता मुर्तुजा भी शायर थे और निदा ने उन्हीं की साहित्यिक विरासत आगे बढ़ाई। जिंदगी के तजुर्बों ने धीरे-धीरे उनकी शायरी की आवाज गढ़ी।

कॉलेज के दिनों में उन्हें एक लड़की से लगाव हो गया था। वह लड़की आगे की कतार में बैठती थी। एक दिन कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर खबर लगी कि हादसे में उसकी मौत हो गई है। निदा को इससे गहरा सदमा लगा। दुख इतना था कि उसे कहने के लिए उनके पास शब्द ही नहीं थे। इसी एहसास ने उन्हें अपनी भावनाओं को समझने और शब्दों में उतारने की तरफ धकेला।

कहा जाता है कि एक सुबह निदा फाजली एक मंदिर के पास से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने सूरदास का भजन 'मधुबन तुम क्यौं रहत हरे?' सुना। यह भजन कृष्ण के विरह में दुखी राधा और गोपियों की भावनाओं को बयान करता है। यह भजन उनके दिल को छू गया। उन्हें एहसास हुआ कि बिछड़ने और अपनों से दूर होने का दर्द सिर्फ उनका अपना नहीं है, दूसरे भी उसे महसूस करते हैं।

इसके बाद उन्होंने कबीर, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई और बाबा फरीद जैसे रचनाकारों को पढ़ा। गालिब और मीर की शायरी से भी उन्होंने प्रेरणा ली। इन सबका असर उनके लेखन में दिखने लगा। वे ऐसी सरल जुबान में लिखने लगे जो आम आदमी को आसानी से समझ आए और जिसे वह अपनी जिंदगी से जोड़ सके।

बंटवारे के दौरान निदा फाजली के माता-पिता पाकिस्तान चले गए, लेकिन उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया। परिवार से दूर रहकर अपनी जिंदगी बनाना आसान नहीं था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी और लेखन के क्षेत्र में संघर्ष शुरू किया।

वे 1964 में मुंबई आए और यहां अखबार में लिखने लगे। धीरे-धीरे उनकी जान-पहचान बढ़ती गई। 1969 में उनकी उर्दू कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ। उनकी शायरी में बनावट नहीं होती थी। वे जिंदगी को जिस नजर से देखते थे, उसी को शब्दों में कागज पर उतार देते थे।

साहित्य के साथ-साथ निदा फाजली ने हिंदी फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई। फिल्म 'रजिया सुल्तान' से उनके फिल्मी गीतों का सफर शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने कई यादगार गीत लिखे। फिल्म 'आहिस्ता-आहिस्ता' का गीत 'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता' और 'सरफरोश' का 'होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है' आज भी चाहने वालों में मशहूर हैं।

उन्होंने अपने अनुभवों और भावनाओं को शायरी की शक्ल दी। मगर उनकी रचनाएं सिर्फ उनकी अपनी जिंदगी की कहानी बनकर नहीं रहीं। आज वे लाखों लोगों के दिलों की आवाज बन चुकी हैं।

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