8 नवंबर को विश्व शहरी नियोजन दिन: बेहतर और व्यवस्थित शहर बनाने की याद दिलाने वाला दिन
हर साल 8 नवंबर को मनाया जाने वाला विश्व शहरी नियोजन दिन 1949 में शुरू हुआ था। यह दिन याद दिलाता है कि शहर सोच-समझकर बसाए जाएं, ताकि लोगों की जिंदगी आसान हो।
आज हम सब सीमेंट के जंगल में रह रहे हैं। लेकिन शहर सिर्फ ईंट और सीमेंट के ढेर से नहीं बनते। उन्हें सही सोच और दूर की नजर के साथ खड़ा किया जाना चाहिए। इसी बात पर पूरी दुनिया में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 8 नवंबर को विश्व शहरी नियोजन दिन (World Town Planning Day) बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
बढ़ती आबादी के दबाव में शहरों की बनावट कैसी हो और इंसान की जिंदगी को कैसे ज्यादा आसान बनाया जाए, इस पर इस दिन वैश्विक स्तर पर मंथन होता है।
इस दिन की शुरुआत 1949 में हुई थी। अर्बन प्लानिंग की अहमियत को सात समंदर पार तक पहुंचाने और लोगों में इसके प्रति दिलचस्पी पैदा करने के लिए सबसे पहले इसे शुरू किया गया। आज यह सिर्फ एक औपचारिक जश्न नहीं रह गया है। चार महाद्वीपों के 30 से ज्यादा देशों में इसे बेहद अहम माना जाता है। इस दिन दुनियाभर के विशेषज्ञ, नगर नियोजक (Urban Planners), वास्तुकला के जानकार (Architects) और शासन चलाने वाले एक साथ बैठते हैं और भविष्य के शहरों के विकास का खाका तैयार करते हैं।
बहुत से लोग मानते हैं कि शहरी नियोजन का मतलब बस खूबसूरत इमारतें, चौड़ी सड़कें और मॉल बनाना है। यह गलतफहमी है, क्योंकि इसका दायरा कहीं बड़ा है। इसमें कई बातें आती हैं। पहली है यातायात का इंतजाम (Traffic & Transport), यानी जाम से बचने के लिए आसान और तेज सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था खड़ी करना। दूसरी है पर्यावरण की रक्षा (Environmental Protection), यानी शहरों में ज्यादा से ज्यादा हरियाली और बगीचे रखना और प्रदूषण घटाने के उपाय करना। तीसरी है जल स्रोत और स्वच्छता (Water Resources & Public Health), यानी पीने के पानी की पक्की उपलब्धता, गंदे पानी का निपटारा और लोगों की सेहत में सुधार। चौथी है सामाजिक विकास, यानी सबके लिए सस्ते घर और सुरक्षित मोहल्ले बनाना।
किसी भी देश की आर्थिक तरक्की में उसके शहरों का बड़ा हिस्सा होता है। शहर बेतरतीब हों तो लोगों को सेहत की दिक्कतें, मानसिक तनाव और यातायात की परेशानी झेलनी पड़ती है। इसके उलट, सही और टिकाऊ नियोजन से संसाधनों का समझदारी से इस्तेमाल होता है। बिजली-ईंधन की बचत होती है, कचरे का ठीक से निपटारा होता है और हवा-पानी साफ रखने में मदद मिलती है। संतुलित विकास से लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठता है और बाढ़ या मौसम में बदलाव जैसी आने वाली आफतों का सामना करना आसान हो जाता है।
आज जब हम स्मार्ट सिटी के दौर में कदम रख रहे हैं, तब पर्यावरण के अनुकूल और इंसान को केंद्र में रखने वाला शहरी नियोजन वक्त की जरूरत बन गया है। 8 नवंबर का दिन बार-बार यही याद दिलाता है कि शहरों को सुरक्षित, सुंदर और रहने लायक बनाने में सरकार के साथ हर नागरिक की भागीदारी अहम है।
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