मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
17:40 IST

नागपुर में 20 लाख से ज्यादा गाड़ियां, पर ट्रैफिक का इंतजाम अब भी 90 के दशक जैसा

नागपुर मेट्रो सिटी बनने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन चौराहों पर ट्रैफिक संभालने का तरीका तीस साल पुराना ही है।

नागपुर में 20 लाख से ज्यादा गाड़ियां, पर ट्रैफिक का इंतजाम अब भी 90 के दशक जैसा
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

नागपुर मेट्रो सिटी की तरफ बढ़ रहा है, मगर शहर का ट्रैफिक मैनेजमेंट आज भी 90 के दशक वाले ढर्रे पर ही चल रहा है। तीस साल पहले भी बड़ीं, वैरायटी चौक, इतवारी, महल, अग्रसेन चौक और कॉटन मार्केट जैसे बड़े चौराहों पर खराब इंफ्रा, घिसे-पिटे नियमों और खराब सेंस की वजह से ट्रैफिक का बुरा हाल दिखता था। आज भी वही हाल दिख रहा है।

नागपुर सुधार न्यास, महापालिका और सिटी ट्रैफिक पुलिस के पास इस बिगड़ती व्यवस्था को संभालने के लिए आज भी वही पुराने साधन हैं: एक लाल-हरा सिग्नल, सड़क पर आधी मिटी जेबरा क्रॉसिंग और चौराहे पर चालान की रसीद काटते सफेद शर्ट वाले पुलिसवाले।

इन तीन दशकों में शहर की आबादी दोगुनी से ज्यादा हो गई और गाड़ियों की तादाद 20 लाख के पार चली गई। फिर भी व्यवस्था में नया सोच, यानी इनोवेशन, अब भी नहीं दिखता। विकास के नाम पर 'सीमेंट का जंगल' और मेट्रो के खंभे मिले। फ्लाईओवर बनने के बाद भी इन खंभों ने बची हुई सड़कों को और तंग कर दिया।

जिले में जब भी कोई नया अधिकारी आता है, तो वही पुराने पैंतरे दोहराए जाते हैं। किसी चौक पर बैरिकेड लगा देना, किसी कट-आउट को सीमेंट से बंद कर देना, स्पीड ब्रेकर बना देना। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत चौराहों पर कैमरे लगे, पर उनका मकसद ट्रैफिक सुचारु करने से ज्यादा चालान काटकर राजस्व जुटाना बन गया है। सवाल यह है कि शहर की यह व्यवस्था आखिर कब बदलेगी।

दुनिया के व्यस्त शहरों को देखें तो समझ आता है कि हम कितने पीछे हैं। जापान के टोक्यो में एआई कैमरे और सेंसर गाड़ियों की गिनती देखकर रियल-टाइम में तय करते हैं कि सिग्नल कितनी देर हरा रहेगा। सिंगापुर ने 'इलेक्ट्रॉनिक रोड प्राइजिंग' यानी ERP लागू की। इसमें पीक आवर्स में भीड़ वाले इलाकों में जाने वाली गाड़ियों पर डिजिटल फीस लगती है, जिससे गैर-जरूरी ट्रैफिक अपने आप घट गया। स्पेन के बार्सिलोना में सुपरब्लॉक्स बने हैं, जहां रिहायशी इलाकों के अंदर भारी वाहनों की एंट्री बंद कर दी गई और अंदर का हिस्सा पैदल चलने वालों और साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित हो गया।

ब्रिटेन, डेनमार्क, नीदरलैंड, स्वीडन, ताइवान और अमेरिका के कई शहरों में बाइक बॉक्स, यानी एडवांस्ड स्टॉप लाइन (एएसएल), बड़े पैमाने पर दिखता है। सिग्नल पर जेब्रा क्रॉसिंग के बाद एक बॉक्स बना होता है, जिसमें सिर्फ साइकिल और बाइक वाले खड़े होते हैं। इससे दोपहिया वाहन कारों और बड़ी गाड़ियों के बीच नहीं फंसते और चालक की सुरक्षा पक्की होती है।

नागपुर में कुछ महीने पहले करीब 20 चौराहों के सिग्नल एआई आधारित किए गए हैं, लेकिन इसे इनोवेशन नहीं कहा जा सकता। आज भी शहर के 99 प्रतिशत सिग्नलों पर लोग 120 सेकंड तक रेड लाइट देखकर परेशान होते हैं।

शहर के ट्रैफिक सिस्टम को ढहने से बचाने के लिए अब कुछ सख्त और आधुनिक कदम उठाने होंगे। कागजों पर 'स्मार्ट' दिखने वाले नागपुर को जमीन पर भी 21वीं सदी का ट्रैफिक सिस्टम देना होगा। स्थिर टाइमर वाले सिग्नल हटाकर एआई आधारित ट्रैफिक एडाप्टिव कंट्रोल सिस्टम (एटीसीएस) तुरंत लागू किया जाए। पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए सिर्फ मेट्रो बनाना काफी नहीं होगा। अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी के लिए फीडर बसें और अलग साइकिल ट्रैक बनाने होंगे, ताकि निजी वाहन कम हों। मुख्य व्यावसायिक इलाकों में पे-एंड-पार्क और मल्टी-लेवल पार्किंग सख्ती से लागू करनी होगी। सड़कों और फुटपाथों से अतिक्रमण हटाए बिना कोई भी मॉडल कामयाब नहीं हो सकता।

ट्रैफिक नियमों पर जागरूकता फैलाने वाली सामाजिक संस्था 'जन आक्रोश' के सचिव और मुख्य संचालक रविन्द्र कासखेड़ीकर ने कहा कि हमारे यहां ट्रैफिक सिस्टम में सुधार की मानसिकता ही नहीं है। उन्होंने कहा कि सीसीटीवी कैमरों से नजर रखने के दावे के बाद आज हजारों करोड़ के चालान पेंडिंग हैं, तो फिर कौन सुधरेगा। उनके मुताबिक इस सेक्टर में हम न्यू टेक्नोलॉजी और आइडियाज अपनाना ही नहीं चाहते।

कासखेड़ीकर ने कहा कि पहले देश की पासपोर्ट सर्विस सबसे घटिया मानी जाती थी, लेकिन टाटा कंपनी को जिम्मेदारी सौंपते ही नजारा बदल गया। उनका मानना है कि ट्रैफिक सिस्टम में सुधार के लिए भी ऐसा ही प्रयोग किया जाना चाहिए।

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे