2050 तक आधी दुनिया को चश्मा लग सकता है, एम्स के विशेषज्ञों की चेतावनी
दिल्ली के एम्स के विशेषज्ञों के मुताबिक बढ़ते स्क्रीन टाइम से नजर की दिक्कत बढ़ रही है और दिल्ली में हर तीन में से एक व्यक्ति को चश्मे की जरूरत है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
बढ़ते स्क्रीन टाइम और बदलती लाइफस्टाइल की वजह से दुनिया भर में नजर की दिक्कत बढ़ रही है। दिल्ली के एम्स (AIIMS) के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि 2050 तक दुनिया के करीब 50 प्रतिशत लोगों को मायोपिया यानी दूर की चीजें साफ न दिखने की समस्या के लिए चश्मे की जरूरत पड़ सकती है। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि दिल्ली में हर तीन में से एक व्यक्ति को चश्मे की जरूरत है।
यह जानकारी एम्स के कम्युनिटी ऑप्थैल्मोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने दी। उनके मुताबिक, नजर की समस्या को पहचानकर जरूरतमंदों तक समय पर आंखों की जांच और चश्मे पहुंचाने के लिए दिल्ली में एक व्यापक एक्शन प्लान तैयार किया जा रहा है। इस प्लान के जरिए प्रभावी रिफ्रैक्टिव एरर कवरेज (ईआरईसी) बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के जिनेवा ऑफिस ने एक विश्लेषण टूल उपलब्ध कराया था। इसकी मदद से दिल्ली में नजर की दिक्कत की स्थिति, सेवाओं में कमियों और संभावित उपायों का अध्ययन किया गया। इसके बाद पूरे दिल्ली के लिए एक्शन प्लान बनाने का फैसला लिया गया।
इस पहल में केंद्र और दिल्ली सरकार के अधिकारी, एम्स के विशेषज्ञ, अलग-अलग राज्यों के कार्यक्रम अधिकारी और आंखों की सेहत पर काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं। करीब 70 लोगों की टीम इस समस्या के उपायों पर चर्चा करेगी। आशा कार्यकर्ताओं और अलग-अलग स्वास्थ्य केंद्रों की मदद से जरूरतमंदों तक चश्मे पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
डॉ. वशिष्ठ की जानकारी के मुताबिक, बच्चों में भी नजर की दिक्कत का प्रमाण बढ़ रहा है। साल 2001 में करीब सात प्रतिशत बच्चों को नजर से जुड़ी समस्या थी। 2012 में एम्स की एक स्टडी में यह प्रमाण 13 प्रतिशत मिला, जबकि मौजूदा कुछ स्टडी के अनुसार यह 20 से 25 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
विशेषज्ञों ने बताया कि बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम इस समस्या के मुख्य कारणों में से एक है। पढ़ाई के लिए कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल और मैदान में खेलने की जगह घर में मोबाइल गेम खेलने का बढ़ता चलन बच्चों की आंखों की सेहत पर असर डाल सकता है।
इस समस्या से निपटने के लिए 2030 तक का लक्ष्य तय किया जाएगा। डॉ. वशिष्ठ ने बताया कि इसका एक्शन प्लान आने वाले एक-दो महीनों में जारी करने की योजना है।