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शाम की देवपूजा के नियम: दिया, मंत्रजप और नैवेद्य में क्या ध्यान रखें

सुबह पूजा न हो पाए तो अपराधबोध न रखें, शाम को देवघर साफ करके दिया लगाएं और अपनी घर की परंपरा के मुताबिक पूजा करें।

शाम की देवपूजा के नियम: दिया, मंत्रजप और नैवेद्य में क्या ध्यान रखें तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

हिंदू धर्म में देवपूजा को बहुत अहम माना गया है। कई लोग चाहते हैं कि दिन की शुरुआत देव के दर्शन, प्रार्थना और नामस्मरण से हो। लेकिन आज की भागदौड़ में नौकरी, व्यवसाय, घर की जिम्मेदारियां और सफर की वजह से हर किसी के लिए सुबह इत्मीनान से पूजा करना मुमकिन नहीं होता। कई बार जल्दबाजी में सिर्फ देवता को नमस्कार करके घर से निकलना पड़ता है। ऐसे में मन में यह भावना आ जाती है कि पूजा ठीक से नहीं हुई और देवता को पूरा वक्त नहीं दे पाए।

मगर भक्ति का असली आधार पूजा में लगाया गया वक्त नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और दिल का भाव है। भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने भक्तिभाव से अर्पित किए गए पत्र, पुष्प, फल और जल को स्वीकार करने का संदेश दिया है। इसलिए सुबह विस्तार से पूजा न हो पाए तो मन में अपराधबोध रखने की जरूरत नहीं है।

अगर सुबह वक्त की कमी से पूजा छोटी रखी और शाम को इत्मीनान से देवता के सामने बैठकर नामस्मरण, स्तोत्रपाठ या आरती की, तो रोज की उपासना का सिलसिला बना रहता है। हां, शाम की पूजा के वक्त कुछ पारंपरिक बातें याद रखना काम आता है।

दिन भर काम करके घर लौटने पर शरीर और मन दोनों थके होते हैं। इसलिए पूजा से पहले खुद को थोड़ा शांत और तरोताजा करना जरूरी है। घर आकर हाथ, पैर और मुंह साफ धो लें। हो सके तो कपड़े बदल लें। फिर पूजाघर साफ करके पूजा के लिए बैठें। सुबह पूजाघर का दिया न लग पाया हो, तो शाम को दिया लगाकर प्रार्थना करें। पूजा शुरू करने से पहले कुछ पल शांत बैठकर अपने इष्टदेवता को याद करें। दिन भर के काम, चिंता और तनाव को एक तरफ रखकर मन एकाग्र करने की कोशिश करें। पूजा सिर्फ धार्मिक क्रिया नहीं, मन को शांति देने वाली साधना भी है।

हिंदू परंपरा में शाम को दिया लगाने का खास महत्व है। सूर्यास्त के बाद घर के पूजाघर में या किसी सही और सुरक्षित जगह पर दिया लगाकर देवता का स्मरण किया जाता है। दीप को ज्ञान, मंगल, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। दिए की रोशनी से पूजाघर का माहौल प्रसन्न होता है और मन को उपासना के लिए अनुकूलता मिलती है। हर घर का कुलाचार, देवता की उपासना और पूजा की पद्धति अलग हो सकती है, इसलिए अपने घर की परंपरा के मुताबिक पूजा करें।

शाम की पूजा के लिए हर बार बड़े विधि-विधान या लंबे मंत्रपाठ की जरूरत नहीं होती। उपलब्ध वक्त के हिसाब से सादी पूजा की जा सकती है। मंत्र इस तरह बताए गए हैं: भगवान शिव के लिए ॐ नमः शिवाय, भगवान श्रीगणेश के लिए ॐ गं गणपतये नमः, भगवान विष्णु के लिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, श्री स्वामी समर्थ के लिए श्री स्वामी समर्थ, श्रीराम के लिए श्रीराम जय राम जय जय राम, और देवी उपासना के लिए ॐ दुं दुर्गायै नमः। इनमें से अपने इष्टदेवता का मंत्र चुनकर कुछ देर जप करें। उसके बाद पसंद का स्तोत्र, श्लोक या आरती बोली जा सकती है। जप करते वक्त गिनती पूरी करने से ज्यादा मन एकाग्र रखने पर ध्यान दें। रोज कुछ मिनट नामस्मरण करने से उपासना की आदत बनी रहती है।

नैवेद्य देवता को अर्पित करना पूजा में भक्तिभाव का अहम हिस्सा है। शाम की पूजा में अपनी परंपरा के मुताबिक फल, शक्कर, मिश्री, दूध या घर में मौजूद कोई सात्त्विक चीज नैवेद्य के तौर पर चढ़ाई जा सकती है। हर बार कोई खास पकवान बनाना जरूरी नहीं। जो घर में है, उसे साफ-सफाई और श्रद्धा से अर्पित करें। नैवेद्य दिखाते वक्त इष्टदेवता को याद करें और फिर घर की परंपरा के मुताबिक उसे प्रसाद के तौर पर ग्रहण करें।

सुबह की पूजा में कई लोग देवता को स्नान कराते हैं, पंचामृत अभिषेक करते हैं या अलग-अलग उपचारों से पूजा करते हैं। लेकिन शाम की पूजा में भी हर बार अभिषेक करना जरूरी है, ऐसा कोई सर्वमान्य नियम नहीं है। रोज की शाम की पूजा में दिया, धूप, नमस्कार, नामजप, स्तोत्रपाठ और आरती से उपासना की जा सकती है। किसी खास देवता की उपासना, व्रत या घर की परंपरा में अभिषेक के अलग नियम हों, तो उनका पालन करें। मूर्ति की सफाई और पूजा की पद्धति के बारे में भी घर की परंपरा का ख्याल रखें।

शाम की पूजा में जल्दबाजी में निपटाने के बजाय कुछ मिनट मन शांत रखें। पूजाघर में गंदगी न रहे, इसका ध्यान रखें। दिया, धूप या अगरबत्ती लगाते वक्त आग से सुरक्षा का ख्याल रखें। पूजा के दौरान मोबाइल या दूसरी चीजों से बार-बार ध्यान न भटकने दें।

कई लोगों के मन में सवाल रहता है कि सुबह दिया न लग पाया या रोज की पूजा छूट गई, तो क्या देवता नाराज होंगे। भक्ति परंपरा में ईश्वर की उपासना में श्रद्धा, प्रेम, ईमानदारी और दिल के समर्पण को अहम माना गया है। इसलिए अनचाहे कारणों से पूजा छूट जाए, तो लगातार अपराधबोध रखने की जरूरत नहीं।

दफ्तर जाने वालों के लिए सुबह की पांच मिनट की पूजा का तरीका भी बताया गया है। जिनके पास सुबह वक्त कम होता है, वे पूजा पूरी तरह छोड़ने के बजाय हालात के हिसाब से सादी उपासना करें। देवता को नमस्कार करके इष्टदेवता को याद करें, अपनी परंपरा के मुताबिक दिया लगाएं, कोई मंत्र या छोटी प्रार्थना बोलें, हो सके तो फूल या नैवेद्य अर्पित करें, और परिवार के सुख, सेहत और सबके कल्याण की प्रार्थना करके घर से निकलें। यह एक आसान दिनचर्या है, कोई बाध्यकारी शास्त्रोक्त नियम नहीं। हालात के मुताबिक इसमें से कुछ बातें की जा सकती हैं, या सिर्फ नमस्कार और नामस्मरण भी किया जा सकता है।

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