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सूखे के बीच नागपुर की जगह मुंबई में हो शीतकालीन सत्र, NGO की मांग

संयुक्त राष्ट्र (ECOSOC) का विशेष सलाहकार दर्जा रखने वाले NGO 'earth' ने मुख्यमंत्री फडणवीस को पत्र भेजकर 30 अक्टूबर तक फैसला मांगा है।

सूखे के बीच नागपुर की जगह मुंबई में हो शीतकालीन सत्र, NGO की मांग तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

एल-निनो की वजह से राज्य में सूखे जैसे हालात हैं। इसी को देखते हुए NGO 'earth' ने मांग की है कि इस साल का शीतकालीन सत्र नागपुर की बजाय मुंबई में कराया जाए। संस्था का कहना है कि इससे जो 300 से 400 करोड़ रुपये बचेंगे, उन्हें सूखे से जूझ रहे लोगों की मदद में लगाया जाए। इस संस्था को संयुक्त राष्ट्र (ECOSOC) का विशेष सलाहकार दर्जा मिला हुआ है।

संस्था के संस्थापक अध्यक्ष प्रविण कलमे ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल को ई-मेल से पत्र भेजा है। पत्र में इन तीन मांगों पर 30 अक्टूबर तक फैसला करने को कहा गया है। संस्था ने चेतावनी दी है कि फैसला नहीं हुआ तो वह सीधे राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष और विधान परिषद के सभापति के पास जाएगी।

संस्था का अंदाज़ा है कि नागपुर में सत्र के लिए दफ्तरों, अफसरों, कर्मचारियों और पुलिस के आने-जाने, रहने और सफर पर कम से कम 300 से 400 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। उसकी मांग है कि सरकार सही आंकड़ा खुद जाहिर करे। संस्था ने कहा है कि नागपुर करार की परंपरा नहीं टूटनी चाहिए, लेकिन सूखे का साल होने से इस बार अपवाद किया जाए। पत्र में याद दिलाया गया है कि कोविड के दौरान 2020 और 2021 का शीतकालीन सत्र मुंबई में ही हुआ था। पत्र के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद 174(1) के तहत सत्र की जगह तय करने का अधिकार राज्यपाल का है।

दूसरी मांग पानी को लेकर है। राज्य में 16 अक्टूबर से पानी की सप्लाई में 10 प्रतिशत की कटौती लागू है, फिर भी निर्माण कार्यों के मीठे पानी के कनेक्शन चालू हैं। संस्था चाहती है कि 2027 की बारिश तक निर्माण, रेडी-मिक्स कंक्रीट, गाड़ी धोने और स्विमिंग पूल के लिए सिर्फ STP का ट्रीट किया हुआ पानी ही जरूरी किया जाए। मुंबई महानगरपालिका ने 16 जून 2026 को तालाबों में स्टॉक 10.35% पर आने के बाद निर्माण के कनेक्शन काट दिए थे। संस्था का कहना है कि वही फैसला पूरे राज्य में लागू हो।

तीसरी मांग टैंकर और कुओं को लेकर है। जालना, छत्रपति संभाजीनगर और धाराशिव में अभी रोज 1,000 टैंकर चल रहे हैं। सरकार ने ही केंद्रीय दल को बताया है कि यह संख्या 5,000 तक जा सकती है। मराठवाड़ा के 171 में से 168 टैंकर निजी हैं। इसलिए संस्था की मांग है कि सूखा घोषित 265 तहसीलों के सभी कुएं, बोरवेल और टैंकर आपदा प्रबंधन कानून 2005 की धारा 24, 34, 65 और 66 के तहत वाजिब मुआवजा देकर सरकार अपने कब्जे में ले और उन्हें GPS से कंट्रोल करे, ताकि पानी की कालाबाजारी रुके।

संस्था ने 29 अप्रैल को पहली बार एल-निनो की चेतावनी दी थी। उसके बाद 22 सितंबर, 26 सितंबर, 15 अक्टूबर और 23 अक्टूबर को भी पत्र भेजे, यानी कुल पांच पत्र। संस्था का दावा है कि किसी का भी लिखित जवाब नहीं आया।

प्रविण कलमे ने कहा, "एल-निनो एक वैश्विक संकट है, इसमें किसी का दोष नहीं। लेकिन इसका सामना कैसे करना है, यह हमारे हाथ में है।" उन्होंने यह भी कहा कि दिसंबर में टैंकर के भरोसे जीने वाले नागरिक की तरफ राज्य का पैसा और ध्यान होना चाहिए, बस इतनी ही मांग है।

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