सिंधुरत्न 2.0 से रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग के पर्यटन को मिल सकती है नई रफ्तार
रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग के विकास की सिंधुरत्न योजना अब 2.0 के दौर में है, और कोकण के पर्यटन को इससे नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
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मंडणगड: रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग, इन दोनों जिलों के हर तरह के विकास के लिए चल रही 'सिंधुरत्न समृद्ध' योजना चार चीजों पर टिकी है। ये हैं पर्यटन, मत्स्य व्यवसाय, फलोत्पादन और बचत समूहों का विकास। फिलहाल इस योजना का अगला चरण 'सिंधुरत्न 2.0' चल रहा है, और इसके जरिए दोनों जिलों को आगे बढ़ाने का बड़ा मौका बन गया है।
खासकर पर्यटन के विकास को इस योजना में ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत बताई जा रही है। सिंधुरत्न योजना के तहत जिले में पर्यटन बढ़ाने के लिए कई तरह के काम चल रहे हैं। जिन किनारों को ब्लू फ्लैग नामांकन मिला है, उन्हें पर्यटन के लिहाज से विकसित करना और कैरावैन पर्यटन का आइडिया, इन दोनों से कोंकण के पर्यटन को नई दिशा मिलने की संभावना है। कहा जा रहा है कि इन कामों का दायरा बढ़ाकर ज्यादा से ज्यादा पर्यटन स्थलों का विकास करना जरूरी है।
अगर गढ़ किलों और ऐतिहासिक जगहों की अच्छी प्रस्तुति की जाए, तो पर्यटक वहां ज्यादा रुक सकते हैं। यही बात फलों के बाग और खेती पर्यटन, साहसी और खेल पर्यटन, समुद्र की जलक्रीड़ा, स्कूबा डाइविंग और पैराग्लाइडिंग जैसे आइडिया पर भी लागू होती है। इन्हें बढ़ावा मिले तो पर्यटकों का ठहराव लंबा हो सकता है। इसका आर्थिक फायदा स्थानीय होटल कारोबार, ट्रांसपोर्ट, छोटे उद्योगों, महिला बचत समूहों और स्थानीय उत्पादकों को भी मिल सकता है।
पर्यटन के भीतर बड़ी अर्थव्यवस्था छिपी है। रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग की कुदरती, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक ताकत को देखें तो यहां पर्यटन के विकास की बड़ी क्षमता है। सिंधुरत्न जैसी असरदार योजनाओं से इस क्षमता को रास्ता देते हुए अगर लंबे वक्त की योजना, जरूरी बुनियादी सुविधाएं और अलग पर्यटन नीति, इन सबका तालमेल बैठाया जाए, तो कोंकण के पर्यटन को बड़ा मंच मिल सकता है।
कोंकण के पर्यटन की पूरी क्षमता का इस्तेमाल करने के लिए अलग और खास पर्यटन नीति की जरूरत बताई गई है। केरल और गोवा ने पर्यटन को अलग नीति के तौर पर प्राथमिकता देकर अपनी स्थानीय अर्थव्यवस्था को रफ्तार दी है। उसी तर्ज पर कोंकण की स्थानीय जरूरतों और खूबियों को ध्यान में रखकर पर्यटन नीति बनाई जाए, तो रोजगार के नए मौके बन सकते हैं।
खानपान और लोककला की ब्रांडिंग का मुद्दा भी उठा है। कोंकण की पुरानी खाने की संस्कृति, जैसे चावल और मछली, को बढ़ावा देते हुए हापुस आम और काजू की राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर असरदार ब्रांडिंग की जा सकती है। आम, काजू और स्थानीय खाने के पदार्थों के महोत्सव करके पर्यटकों को कोंकणी संस्कृति से जोड़ा जा सकता है। साथ ही स्थानीय लोककला, पारंपरिक कारोबार और सांस्कृतिक विरासत को भी बढ़ावा देने की जरूरत है।