रत्नागिरी में 4 और परमाणु प्रोजेक्ट प्रस्तावित, जैतापुर को लेकर लोगों का गुस्सा बढ़ा
जैतापुर अणुऊर्जा प्रोजेक्ट अब तक शुरू नहीं हुआ है और रत्नागिरी जिले में चार और अणुऊर्जा प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं। दापोली और राजापुर से जनआंदोलन की शुरुआत हुई है।
जैतापुर अणुऊर्जा प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुए दस साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन यह अब तक चालू नहीं हो पाया है। स्थानीय लोगों का भारी विरोध था, फिर भी उसे दरकिनार करके प्रोजेक्ट खड़ा करने की कार्रवाई शुरू की गई थी। अब 15 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है और प्रोजेक्ट अब भी शुरू नहीं हुआ।
इसी बीच रत्नागिरी जिले में 4 और अणुऊर्जा प्रोजेक्ट प्रस्तावित किए गए हैं। इससे जिले के लोगों का विरोध और तेज हो गया है और पूरे इलाके में गुस्सा फैल गया है। जनआंदोलन की शुरुआत दापोली और राजापुर से हुई है। सरकार के स्तर पर हमेशा की तरह यही जवाब दिया जा रहा है कि ये प्रोजेक्ट सिर्फ प्रस्तावित हैं और इन्हें अभी मंजूरी नहीं मिली है।
राजापुर के रिएक्टर और स्थानीय विरोध का मामला चल ही रहा था कि अब चर्चा शुरू हो गई है कि राजापुर के अणुऊर्जा प्रोजेक्ट के रिएक्टर देश में ही बनाए जाएंगे। इस वजह से रत्नागिरी समेत पूरे कोकण में इन प्रोजेक्टों के खिलाफ माहौल एक बार फिर गरमाने लगा है।
जैतापुर में प्रस्तावित प्रोजेक्ट की क्षमता 9.6 गिगावॉट यानी 9,600 मेगावॉट है और इसे दुनिया के सबसे बड़े प्रोजेक्टों में गिना जाता है। इसमें 1650 मेगावॉट क्षमता के कुल 6 यूरोपियन प्रेशराइज्ड रिएक्टर लगाने की योजना है। फ्रांस की एक कंपनी इस प्रोजेक्ट के लिए मुख्य तकनीक सप्लायर और कंट्रैक्टर के तौर पर काम कर रही है।
भारत और फ्रांस के बीच सिविल अणुऊर्जा सहयोग को फिर रफ्तार देने के लिए हाल ही में नई दिल्ली में एक उच्चस्तरीय बैठक हुई। इसमें केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और फ्रांस की कंपनी इलेक्ट्रिसिटी डी फ्रांस के प्रतिनिधि मौजूद थे। बैठक में दोनों देशों के बीच इस पर सहमति बनी कि यूरोपियन रिएक्टरों के लिए जरूरी पुर्जे, इंजीनियरिंग का सामान और तरह-तरह के उपकरण भारत में ही बनाए जाएंगे।
स्थानीय लोगों का विरोध पहले ही तेज हो रहा था। अब इस तकनीक के पुर्जे भारत में बनने की बात आने से लोगों में डर और गुस्से का माहौल बन गया है।
दावा किया जा रहा है कि इससे भारतीय सप्लायरों को बड़ा मौका मिलेगा। लेकिन स्थानीय स्तर पर लोग यह आशंका जताकर विरोध कर रहे हैं कि इससे प्रोजेक्ट हमेशा के लिए थोप दिया जाएगा।
उधर भारत के ऊर्जा मंत्रालय ने सिविल अणुऊर्जा क्षेत्र में निजी और विदेशी साझेदारों की भागीदारी आसान बनाने के लिए नए नियमों का ढांचा तैयार करना शुरू किया है। सरकार का कहना है कि इससे लाइसेंस देने की प्रक्रिया तेज होगी और वक्त पर पूरी होगी। यह भी कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार के इस फैसले से जैतापुर जैसे अटके हुए और बड़े प्रोजेक्टों की कानूनी, आर्थिक और तकनीकी अड़चनें दूर होंगी और काम को रफ्तार मिलेगी।
दूसरी तरफ आंदोलनकारी और स्थानीय ग्रामीण शंका जता रहे हैं कि निजी क्षेत्र के आने और नियमों में ढील दिए जाने से सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होंगे।