सर्वपित्री अमावस्या पर पीपल के पेड़ के पास पूजा, दीया और मंत्र जाप की परंपरा
अश्विन की अमावस्या पर पीपल की पूजा, दीये और मंत्र जाप के उपाय बताए गए हैं। इस बार यह दिन शनिश्चरी अमावस्या के साथ पड़ रहा है।
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अश्विन महीने की अमावस्या को सर्वपित्री अमावस्या कहा जाता है, और यह पितृपक्ष का आखिरी दिन होता है।
इस दिन श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और पीपल के पेड़ की पूजा जैसी विधियों से पूर्वजों को विदाई दी जाती है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है। इस बार सर्वपित्री अमावस्या और शनिश्चरी अमावस्या एक ही दिन पड़ रही हैं, इसलिए इस दिन की अहमियत और बढ़ गई है।
ज्योतिषशास्त्र के मुताबिक सर्वपित्री अमावस्या पर पीपल से जुड़े कुछ ज्योतिषीय उपाय करने से सिर्फ पूर्वज ही प्रसन्न नहीं होते, बल्कि भगवान शनिदेव का आशीर्वाद भी मिलता है। बताया गया है कि ये उपाय पितृदोष समेत कई पापों से मुक्ति देते हैं और पूर्वजों की आत्माओं को संतुष्ट करते हैं।
पहला उपाय पीपल के पेड़ की पूजा का है, जिसे इस दिन बहुत शुभ माना जाता है। इसमें पीपल को दूध और काले तिल मिला हुआ पानी चढ़ाया जाता है। उसके बाद पांच तरह की मिठाई अर्पित की जाती है और घी का दीया जलाया जाता है। फिर पीपल के नीचे बैठकर अपने पूर्वजों का ध्यान किया जाता है और जाने-अनजाने में हुई किसी भी गलती के लिए माफी मांगी जाती है। आखिर में पेड़ की सात परिक्रमा करके अपनी परेशानियां कही जाती हैं।
दूसरा उपाय पीपल के नीचे दीया जलाने का है। सर्वपित्री अमावस्या की शाम पीपल के नीचे आटे के और सरसों के तेल के सात दीये जलाए जाते हैं। फिर पूर्वजों और शनिदेव का ध्यान करके उनके आशीर्वाद के लिए प्रार्थना की जाती है। कहा गया है कि इससे पितृदोष दूर होता है और पूर्वज व शनिदेव, दोनों का आशीर्वाद मिलता है।
तीसरा उपाय मंत्र जाप का है। इस दिन पीपल की जड़ों में शक्कर, चावल, पानी, कच्चा दूध और फूल चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद 'ॐ पितृभ्यः नमः' मंत्र का जाप किया जाता है और पितृसूक्त या पितृस्तोत्र का पाठ किया जाता है। माना जाता है कि इससे पूर्वजों की आत्माओं को संतोष मिलता है और सुख, शांति व समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
चौथा उपाय शनिदेव की पूजा का है। सर्वपित्री अमावस्या और शनिश्चरी अमावस्या एक ही दिन आने की वजह से पूर्वजों की पूजा के साथ शनिदेव की पूजा भी फायदेमंद मानी जाती है। इसके लिए शनिदेव के मंदिर जाकर सरसों के तेल का दान किया जाता है और शनि चालीसा का पाठ किया जाता है। बताया गया है कि इससे शनिदोष और पितृदोष के बुरे असर कम होते हैं और मन को शांति मिलती है।
परंपरा के तौर पर पीपल के पेड़ के पास तिल के तेल का दीया जलाया जाता है। वहीं शनिदेव की कृपा के लिए शनि मंत्र का जाप और तेल का दीया लगाने की रीत है।