संजय राऊत बोले, लेखकों को कभी-कभी जेल भेजना चाहिए; 'बोध कीर्तन' किताब का विमोचन
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मुंबई में संजय राऊत की किताब 'बोध कीर्तन' का विमोचन हुआ। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक ही मंच पर थे।
शिवसेना सांसद और ठाकरे गुट के नेता संजय राऊत अपने बेबाक बयानों की वजह से अक्सर चर्चा में रहते हैं। इस बार उनका अंदाज थोड़ा अलग दिखा। मौका था उनकी किताब 'बोध कीर्तन' के विमोचन समारोह का। मुंबई में हुए इस कार्यक्रम में राऊत ने साहित्य, अध्यात्म, जेल के अनुभव और राजनीतिक नेताओं के भाषणों पर खुलकर बात की। उनकी कुछ बातों पर वहां मौजूद लोग हंस पड़े।
राऊत की लिखी 'बोध कीर्तन' के विमोचन का कार्यक्रम बड़े उत्साह से हुआ। शिवसेना उबाठा गुट के पक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे, मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे और लेखक अंबरिश मिश्र मुख्य मेहमान के तौर पर आए थे। यानी उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक ही मंच पर नजर आए।
बोलते हुए राऊत ने कहा कि महाराष्ट्र में हर किताब का उत्सव होना चाहिए। हम खाने-पीने की चीजों और कपड़ों के उत्सव मनाते हैं, तो फिर मराठी साहित्य का उत्सव क्यों न हो? उन्होंने कहा कि मुंबई जैसी राजधानी के शहर में लोग मराठी साहित्य पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा होते हैं, यह दिखाने की जरूरत है।
किताब के नाम को लेकर राऊत ने चुटकी ली। उन्होंने कहा कि 'बोध कीर्तन' नाम सुनकर कुछ लोगों को सवाल हो सकता है कि संजय राऊत आध्यात्मिक कैसे हो सकते हैं। उनके मुताबिक अच्छा वक्ता वही है जो अच्छा कीर्तनकार भी हो। वक्ता के पास कहने लायक कुछ हो, तभी उसका कीर्तन असरदार बनता है।
जेल में बिताए 105 दिनों के अनुभव पर राऊत ने कहा, "कभी-कभी लेखकों को जेल भेजना चाहिए, इससे बेहतरीन साहित्य तैयार होगा।" इस बयान पर कार्यक्रम में हंसी गूंज उठी। उन्होंने सावरकर, तिलक और दूसरे लेखकों का भी जिक्र किया, जिन्होंने जेल में साहित्य रचा।
राऊत ने नरेंद्र मोदी के राम मंदिर प्राणप्रतिष्ठा के वक्त दिए भाषण का भी हवाला दिया। उन्होंने बताया कि जेल में रहते हुए उन्होंने वह भाषण सुना और लिख लिया था। टेलीप्रॉम्प्टर के बिना दिया गया वह भाषण उन्हें सहज और अराजनीतिक लगा और पसंद आया, इसलिए उसे उन्होंने किताब में शामिल किया।
राऊत ने कहा कि उनके अंदर भी भावनाएं हैं, उन्हें कविताएं पसंद हैं और साहित्यकारों से बातचीत करना अच्छा लगता है। मशहूर कवि ग्रेस 'सामना' में उनके केबिन में घंटों बैठा करते थे। राऊत के मुताबिक ऐसे कई साहित्यिक दोस्तों से हुई बातचीत से ही 'बोध कीर्तन' तैयार हुई।
इस विमोचन समारोह से संजय राऊत के साहित्यिक और निजी अनुभवों का एक अलग पहलू सामने आया।
कमेंट
अभी कोई कमेंट नहीं। पहले आप लिखिए।