शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज: संतशक्ति को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने वाले संत

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज: संतशक्ति को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने वाले संत तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज की पुण्यतिथि पर उनके राष्ट्र निर्माण, ग्रामविकास और बंधुभाव के काम की याद।

भारतीय संत परंपरा ने अध्यात्म के साथ समाज प्रबोधन, समता और मानवता के मूल्यों को भी संभाला है। इस परंपरा को आधुनिक राष्ट्र निर्माण की दिशा देने वाले राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज बीसवीं सदी के एक लोकोत्तर व्यक्तित्व थे। उन्होंने समाज को यह एहसास कराया कि आजादी हासिल करना राष्ट्र निर्माण का आखिरी मकसद नहीं है। असली जिम्मेदारी आजाद भारत को समता पर टिका, स्वावलंबी, एकात्म और समृद्ध बनाने की है। इसीलिए उनका काम सिर्फ संत परंपरा तक सीमित नहीं रहा, वह नवभारत के निर्माण से जुड़ गया।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें अभिवादन करते हुए लगता है कि समाज और समाज के संत समुदाय को उनके बनाए आदर्श पर चलना चाहिए। भारत के नवनिर्माण के लिए हर दौर में यहां की सज्जनशक्ति का एकजुट होना जरूरी लगता है।

आजादी के बाद भारत के सामने सामाजिक विषमता, धर्मों के बीच असंतोष, निरक्षरता, ग्रामीण गरीबी, जातिभेद और राष्ट्रीय एकात्मता की चुनौतियां थीं। इस हालत में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यह भूमिका रखी कि समाज के मन पर असर डालने वाले संत राष्ट्र निर्माण के काम में सक्रिय हिस्सा लें। इस भूमिका को पूरे देश तक पहुंचाने का बीड़ा राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज ने उठाया। राष्ट्रपति भवन में उनके खंजिरी भजन और राष्ट्रभक्ति के विचारों से उनका काम राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा।

उनके काम का सार यह था कि संतों का प्रभाव सिर्फ धार्मिक श्रद्धा तक न रहे, बल्कि लोकशिक्षा, सामाजिक बदलाव और देशसेवा के काम आए। देश भर के संतों को व्यापक राष्ट्रहित के काम के लिए एक साथ लाने की उनकी कोशिशों को 1956 में अहम मोड़ मिला। दिल्ली में अलग-अलग अखाड़ों, राज्यों और धर्मपीठों के धर्माचार्यों और संतों की भागीदारी से भारत साधू समाज की स्थापना हुई। गुरुकुंज आश्रम के जीवनदर्शन से जुड़े दर्ज ब्योरों के मुताबिक इस संस्था की स्थापना में राष्ट्रसंत ने अहम भूमिका निभाई और वे सर्वसम्मति से पहले अध्यक्ष चुने गए।

राष्ट्रसंत का राष्ट्रकार्य आजादी के बाद शुरू नहीं हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने भजन और कीर्तन के जरिए जनजागृति की। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनकी राष्ट्रभक्ति की रचनाओं ने लोगों के मन में आजादी की प्रेरणा जगाई। चिमूर, आष्टी और यावली इलाकों में उनके शब्दों ने राष्ट्रभक्ति की चिंगारी भड़काई। 'आते है नाथ हमारे' भजन की पंक्तियों 'झाड़-झंखाड़ शस्त्र बनेंगे! भक्त बनेंगे सेना, पत्थर सारे बॉम्ब बनेंगे, नाव लगेगी किनारे' जैसे स्फूर्तिगीतों ने ग्रामीण इलाकों के लोगों को आंदोलन से जोड़ा। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार किया और उन्हें जेल भी भुगतनी पड़ी।

उन्होंने लोकभाषा, लोकसंगीत और गांव-गांव के जनसंपर्क के असरदार जरियों का इस्तेमाल राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए किया। उनकी नजर में आजादी का मतलब सिर्फ परायी सत्ता से मुक्ति नहीं थी, बल्कि समाज के अन्याय, अज्ञान और विषमता से भी मुक्ति थी।

भारत गांवों का देश है और गांवों की तरक्की के बिना देश की हर तरह की तरक्की मुमकिन नहीं, यह राष्ट्रसंत की पक्की धारणा थी। इसी सोच से उन्होंने ग्रामगीता ग्रंथ लिखा। गांव की स्वच्छता, शिक्षा, श्रम की प्रतिष्ठा, सहकारिता, नशामुक्ति, नैतिकता, स्वावलंबन और लोगों की भागीदारी को जोड़ने वाला यह ग्रामविकास का विचार है। 'गांव है विश्व का नक्शा, गांव से देश की परीक्षा' उनके विचारों की दिशा बताने वाली पंक्ति है। उनके काम से दिखता है कि ग्रामविकास सिर्फ सड़क, पानी और इमारतों के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव के लोगों की सोच, बर्ताव और आपसी रिश्तों में बदलाव लाने की प्रक्रिया है।

1935 में स्थापित गुरुकुंज आश्रम के जरिए उन्होंने समाजसेवा, सामुदायिक प्रार्थना और रचनात्मक कामों को बढ़ावा दिया। अखिल भारतीय श्री गुरुदेव सेवा मंडल के जरिए ग्रामोन्नति का विचार बड़े जनसमुदाय तक पहुंचाया। गांव वाले अपने विकास की जिम्मेदारी खुद उठाएं और श्रमदान से सामूहिक तरक्की करें, यह उनके काम का अहम संदेश था।

राष्ट्र निर्माण का मतलब सिर्फ विकास की योजनाएं नहीं, बल्कि संकट के वक्त देशवासियों की मदद के लिए दौड़ पड़ना भी है। बंगाल के अकाल के दौरान, 1962 में चीन के हमले की पृष्ठभूमि में, कोयना भूकंप के बाद और 1965 में पाकिस्तान के हमले के वक्त राष्ट्रसंत ने राहत कार्य और जनजागृति के जरिए राष्ट्रसेवा का आदर्श रखा। उनका काम अध्यात्म और कृति के बीच का फासला मिटाने वाला था। जात, धर्म, पंथ और भाषा से आगे जाकर भारतीय समाज में भाईचारा बनाना उनकी राष्ट्र निर्माण की सोच का बुनियादी सूत्र था। सामुदायिक प्रार्थना से उन्होंने समाज के सभी घटकों को एक साथ लाने की कोशिश की। उनका यही लोकप्रिय भजन राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर का विश्वविद्यालय गीत है।

1955 में जापान में हुई विश्व धर्म परिषद और विश्वशांति परिषदों में हिस्सा लेकर उन्होंने मानवता और विश्वबंधुत्व का संदेश देश के बाहर भी पहुंचाया। उनका राष्ट्र निर्माण का विचार भारत की सरहदों तक सीमित नहीं था, वह विश्वशांति के व्यापक मूल्यों से जुड़ा था। संत ज्ञानेश्वर के बंधुभाव वाले पसायदान को उन्होंने अपनी खंजिरी की संगत दी। जापान में भी उन्होंने विश्वबंधुत्व का नारा देते हुए दुनिया की सत्प्रवृत्तियों को एक साथ लाने का वैश्विक काम किया।

राष्ट्रसंत ने भजन से जनजागृति की, संगठन से समाजसेवा की ताकत खड़ी की और ग्रामगीता से ग्रामविकास का विचार रखा। संतशक्ति को रचनात्मक राष्ट्रकार्य में शामिल करना, आम आदमी को विकास का सक्रिय भागीदार बनाना और सामाजिक एकात्मता से राष्ट्र खड़ा करना उनके काम की खासियतें थीं। आज विकसित भारत की संकल्पना में ग्रामविकास, नागरिकों की भागीदारी, सामाजिक एकात्मता और स्वावलंबन को अहमियत है। इन सभी मूल्यों पर राष्ट्रसंत ने अपने काम से कई दशक पहले जोर दिया था। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए उनके विचारों को सिर्फ तारीफ तक सीमित न रखकर असल अमल में लाना जरूरी है।

भाईचारे से जुड़ा समाज, स्वावलंबी गांव और सेवाभावी नागरिकों के दम पर ही नवभारत की मजबूत नींव पड़ सकती है, यह उनके जीवनकार्य का आज भी प्रेरणा देने वाला संदेश है। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र अभिवादन।

#नागपुर#कल्चर#PT24#Culture#Nagpur

विज्ञापन

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप 'आप' पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे