गुरूवार, 15 अक्टूबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
03:08 IST

पढ़ाई में पीछे बच्चों के लिए राधिका भावे और शिल्पा कुलकर्णी ने शुरू किया राशी पीओएस फाउंडेशन

राधिका भावे और शिल्पा कुलकर्णी ने राशी पीओएस फाउंडेशन के जरिए विशेष शैक्षणिक जरूरतों वाले बच्चों के लिए काम शुरू किया।

पढ़ाई में पीछे बच्चों के लिए राधिका भावे और शिल्पा कुलकर्णी ने शुरू किया राशी पीओएस फाउंडेशन तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

हर बच्चा दूसरे से अलग होता है। किसी के सीखने का तरीका अलग होता है, किसी की समझ अलग और आगे बढ़ने की रफ्तार भी सबकी अपनी होती है। स्कूल की तय पढ़ाई के ढांचे में कुछ बच्चे उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ पाते। ऐसे बच्चों को अक्सर पढ़ाई में कमजोर, ध्यान न देने वाला या क्लास में परेशान करने वाला मान लिया जाता है। राधिका भावे और शिल्पा कुलकर्णी का कहना है कि इन बच्चों की दिक्कत समझकर उन्हें सही पढ़ाई और सहारा दिया जाए, तो उनकी क्षमता खुल सकती है। इसी सोच से उन्होंने राशी पीओएस फाउंडेशन के जरिए विशेष शैक्षणिक जरूरतों वाले बच्चों के लिए काम शुरू किया।

दोनों पहले आम स्कूलों में स्पेशल एजुकेटर यानी विशेष शिक्षिका के तौर पर काम करती थीं। उन्होंने देखा कि कुछ बच्चे क्लास में लगातार घूमते रहते हैं, पढ़ाई में ध्यान नहीं देते या बाकी बच्चों के मुकाबले सीखने में पीछे रह जाते हैं। ऐसे बच्चों को अक्सर विशेष शिक्षकों के पास भेज दिया जाता था। लेकिन दोनों को समझ आया कि इन बच्चों की दिक्कत सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है, उनके सीखने के तरीके ही अलग हो सकते हैं। जब लगा कि इन्हें पढ़ाने का तरीका बदलना पड़ेगा, तो उन्होंने अलग से काम करने का फैसला किया और इसी से राशी पीओएस फाउंडेशन की शुरुआत हुई।

सबसे बड़ी चुनौती पालकों का भरोसा जीतना थी। विशेष शैक्षणिक जरूरतों वाले बच्चों के लिए अलग पढ़ाई का इंतजाम खड़ा करना जितना मुश्किल था, पालकों को उसकी अहमियत समझाना भी उतना ही चुनौती भरा था। कई पालकों के लिए बच्चे को आम स्कूल से निकालकर अलग तरीके की पढ़ाई में डालना शुरू में मानना आसान नहीं था। उन्हें चिंता रहती थी कि बच्चा दूसरों से पीछे तो नहीं रह जाएगा और उसका भविष्य क्या होगा। राधिका और शिल्पा ने पालकों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि पढ़ाई का बोझ कम करके और बच्चे की जरूरत के हिसाब से पढ़ाया जाए, तो उसका पूरा विकास हो सकता है।

उन्होंने बताया कि फाउंडेशन की जानकारी पालकों तक पहुंचाने के लिए कोई बड़ा विज्ञापन अभियान नहीं चलाया गया। शुरू में कुछ पालकों को उनके काम की जानकारी थी। उन्होंने दूसरे पालकों को फाउंडेशन के बारे में बताना शुरू किया। इस तरह एक-दूसरे के अनुभव से फाउंडेशन की पहचान बढ़ती गई और बच्चों के दाखिले भी बढ़ने लगे।

फाउंडेशन की पढ़ाई का सबसे अहम हिस्सा हर बच्चे के लिए अलग योजना है। राधिका और शिल्पा ने कहा कि हर बच्चे की दिक्कतें और जरूरतें अलग होती हैं, इसलिए सबको एक ही तरीके से पढ़ाना ठीक नहीं बैठता। किसी बच्चे को डिस्लेक्सिया के लिए खास मार्गदर्शन चाहिए होता है, तो किसी को ऑक्युपेशनल थेरपी की जरूरत पड़ सकती है। अपने काम को समझाते हुए उन्होंने कहा, "हमारे यहां 50 बच्चे नहीं हैं, बल्कि 50 अलग-अलग क्लासरूम हैं।" इसका मतलब है कि हर बच्चे के लिए अलग पढ़ाई की योजना बनती है। बच्चा तय तरीके के हिसाब से ढले, इसके बजाय पढ़ाई का तरीका बच्चे की जरूरत के हिसाब से बदला जाता है।

ADHD, डिस्लेक्सिया, डिस्प्रैक्सिया और डिस्कैल्कुलिया जैसी स्थितियों पर भी बात हुई। कुछ बच्चों को ध्यान टिकाने में दिक्कत होती है, जबकि कुछ को पढ़ने, लिखने, गणित या हरकतों के तालमेल में अड़चन आ सकती है। दोनों ने कहा कि ऐसे बच्चों को बार-बार कम आंकने के बजाय उनकी दिक्कत समझना जरूरी है। बच्चों की जरूरत के हिसाब से ऑक्युपेशनल थेरपी, विशेष शिक्षा और नियमित अभ्यास को शामिल किया जाता है।

फाउंडेशन ने इन बच्चों की पढ़ाई के लिए NIOS यानी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग की व्यवस्था चुनी है। आम स्कूलों में विद्यार्थियों को एक शैक्षणिक साल में कई विषयों की परीक्षाएं देनी पड़ती हैं। NIOS में लागू नियमों के मुताबिक विषयों और परीक्षाओं की योजना ज्यादा लचीले ढंग से बनाई जा सकती है। इससे कुछ विद्यार्थियों को अपनी क्षमता के हिसाब से पढ़ाई के लिए ज्यादा वक्त मिल सकता है। उन्होंने बताया कि इसका मकसद बच्चों पर गैरजरूरी दबाव कम करना और उन्हें भरोसे के साथ आगे बढ़ने का मौका देना है।

कोरोना महामारी के दौरान फाउंडेशन के सामने नई चुनौती खड़ी हुई। विशेष शैक्षणिक जरूरतों वाले बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाना आसान नहीं था। पूरी शिक्षक टीम को नए सिरे से तैयारी करनी पड़ी। ऑनलाइन पढ़ाई के लिए अलग-अलग साधन, प्रेजेंटेशन, टाइम-टेबल और पढ़ाने के तरीके तैयार किए गए। इस दौरान पालक भी बच्चों की पढ़ाई में ज्यादा शामिल हुए। उन्होंने बताया कि नियमित मार्गदर्शन से कुछ बच्चों के पढ़ने, लिखने और खुद से पढ़ाई करने की क्षमता में सुधार दिखा।

राशी पीओएस फाउंडेशन में सिर्फ किताबी पढ़ाई पर जोर नहीं दिया जाता। बच्चों के पूरे विकास के लिए नृत्य, संगीत और दूसरी गतिविधियों को भी अहमियत दी जाती है। बच्चों को हिप-हॉप और भरतनाट्यम जैसे नृत्य सिखाए जाते हैं। नृत्य से बच्चे दाएं-बाएं की दिशा समझना, शरीर का तालमेल रखना, हरकतों का क्रम याद रखना और समूह में शामिल होना सीखते हैं। राधिका और शिल्पा के मुताबिक ऐसी गतिविधियों से बच्चों में पढ़ाई का डर कम हो सकता है और आत्मविश्वास बढ़ सकता है।

आर्ट थेरपी जैसी कला की गतिविधियां भी इस्तेमाल होती हैं। कुछ बच्चों को अपनी भावनाएं शब्दों में बताना मुश्किल लगता है। ऐसे में चित्रकला और दूसरी कलात्मक गतिविधियां उनके लिए अपनी बात कहने का जरिया बन सकती हैं। कोई बच्चा पढ़ाई में पीछे हो, फिर भी चित्रकला में बेहतरीन काम कर सकता है। ऐसे बच्चों की कला को बढ़ावा दिया जाए, तो उन्हें कामयाबी की खुशी का अनुभव होता है। उन्होंने बताया कि बार-बार नाकामी झेलने वाले बच्चों के लिए किसी गतिविधि में मिली छोटी सी कामयाबी भी अहम होती है।

दोनों ने बच्चों को प्यार से समझने पर खास जोर दिया। उनके मुताबिक बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाने की शुरुआत उसकी क्षमताओं को स्वीकार करने से होती है। उनमें क्या कमी है, इससे ज्यादा यह देखना जरूरी है कि वे क्या कर पाते हैं। बच्चों की हर छोटी प्रगति की तारीफ करना, उनकी दिक्कतें समझना और उन्हें सुरक्षित माहौल देना, इन बातों को उन्होंने अहम बताया।

राधिका भावे और शिल्पा कुलकर्णी ने विशेष शिक्षा को देखने का सकारात्मक नजरिया रखा। हर बच्चे की क्षमता अलग होती है। कुछ बच्चों को सीखने में ज्यादा वक्त लगता है और कुछ को अलग तरीके से पढ़ाना पड़ता है। लेकिन इससे उन बच्चों की काबिलियत कम नहीं हो जाती। बच्चों को उनकी जरूरत के हिसाब से पढ़ाई, सही मार्गदर्शन और प्यार भरा माहौल मिले, तो उनकी क्षमताओं को मौका मिल सकता है। राशी फाउंडेशन के काम से यही संदेश सामने आता है।

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे