ऑपरेशन सिंदूर पर पोस्ट शेयर करने वाली पुणे की छात्रा पर दर्ज FIR हाईकोर्ट ने रद्द की
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि पोस्ट सिर्फ आपत्तिजनक लगना आपराधिक कार्रवाई के लिए काफी नहीं है। पुणे की इंजीनियरिंग छात्रा की याचिका मंजूर हुई।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी एक सोशल मीडिया पोस्ट दोबारा शेयर करने के मामले में पुणे की इंजीनियरिंग की छात्रा खदीजा शहाबुद्दीन शेख के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि कोई पोस्ट सिर्फ आपत्तिजनक लग जाए, इतने से आपराधिक कार्रवाई नहीं बनती। इसके लिए कानून के हिसाब से जरूरी आपराधिक कृत्य या मंशा का होना लाजमी है।
जस्टिस मिलिंद एन. जाधव की बेंच ने 27 अक्टूबर को यह आदेश दिया। आदेश में दर्ज है कि छात्रा उस मूल पोस्ट की लेखिका नहीं थी। उसने किसी और की पोस्ट इंस्टाग्राम पर शेयर की थी और सिर्फ दो घंटे के भीतर उसे डिलीट कर दिया था। इसके अलावा उसने सार्वजनिक रूप से खेद जताते हुए माफी भी मांगी थी।
अब मामले की पृष्ठभूमि देखें। पुणे शहर के कोंढवा पुलिस स्टेशन में 9 मई 2025 को छात्रा के खिलाफ FIR दर्ज हुई थी। पुलिस का कहना था कि 7 मई 2025 को गश्त के दौरान एक पुलिस हवलदार की नजर इस सोशल मीडिया पोस्ट पर पड़ी। भारत-पाकिस्तान युद्ध से जुड़ी इस पोस्ट पर पुलिस का आरोप था कि वह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली है और समाज में तनाव पैदा करने वाली है।
सुनवाई में छात्रा के वकीलों ने दलील दी कि उसने यह पोस्ट खुद नहीं बनाई थी और उसे तुरंत हटाकर माफी भी मांग ली थी। उसके खिलाफ पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वकीलों का कहना था कि बेवजह चल रही इस आपराधिक कार्रवाई से उसके उज्ज्वल करियर पर बुरा असर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ राज्य सरकार के वकील अमित पालकर ने FIR रद्द करने का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि पोस्ट भले किसी और की हो, उसे दोबारा शेयर करने से उसका प्रसार होता है और धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। उनके मुताबिक सिर्फ पोस्ट डिलीट कर देने या माफी मांग लेने से आपराधिक जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि किसी पोस्ट से सिर्फ गुस्सा या असंतोष फैलने की आशंका आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए काफी नहीं है। कानून की धाराओं के तहत अपराध के जरूरी तत्वों का मौजूद होना अनिवार्य है।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी लिखा कि पोस्ट हटाने के बाद छात्रा ने उसे आगे नहीं फैलाया। धार्मिक दुश्मनी फैलाने की कोई सोची-समझी कोशिश भी सामने नहीं आई है। छात्रा की कम उम्र और उसके भविष्य को देखते हुए, सही सबूतों के बिना अनजाने में हुई हरकत को जानबूझकर किया गया आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि मुकदमे और सजा का मकसद सुधार होना चाहिए, सिर्फ सजा देना नहीं।
इन सब बातों पर गौर करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कोंढवा पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR क्रमांक 380/2025 रद्द कर दी और छात्रा की याचिका मंजूर कर ली।
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