नागपुर स्टेशन की पार्किंग में रसीद गायब, कैश देने पर भी अंतिम रसीद नहीं, होगी जांच
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नागपुर रेलवे स्टेशन के ड्रॉप एंड गो और पार्किंग में वाहन चालकों से एंट्री की रसीद वापस ले ली जाती है। वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक अमन मित्तल ने जांच की बात कही है।
नागपुर रेलवे स्टेशन के पूर्वी और पश्चिमी, दोनों तरफ चल रही 'ड्रॉप एंड गो और पार्किंग' व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। वाहन चालकों का आरोप है कि स्टेशन परिसर में घुसते समय उन्हें समय दर्ज की हुई रसीद मिलती है, लेकिन बाहर निकलते वक्त एग्जिट पॉइंट पर वही रसीद वापस ले ली जाती है। नकद पैसे देने के बाद भी उन्हें अंतिम रसीद नहीं दी जा रही। शिकायत करने वालों का कहना है कि यह धारा 2(11) और 2(47) का खुला उल्लंघन है।
चालकों के मुताबिक विवाद यहीं खत्म नहीं होता। कोई जागरूक चालक अपने अधिकार की बात करके रसीद लौटाने को कहे तो पार्किंग कर्मी बहस पर उतर आता है और इतना कुछ सुना देता है कि चालक आगे बढ़ जाना ही ठीक समझता है। ऐसा लगता है जैसे कर्मचारियों को इसके लिए खास ट्रेनिंग दी गई हो।
इस सबके बीच नई सुविधा का एक फायदा भी दिख रहा है। ड्रॉप एंड गो और अंडरग्राउंड पार्किंग शुरू होने के बाद पश्चिमी हिस्से में इमारत के सामने की जगह पहले से काफी खुली है और वहां वाहनों की भीड़ नहीं दिखती। ड्रॉप एंड गो में 50 रुपये बचाने के लिए लोग 12 मिनट के भीतर गाड़ी बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। मगर एग्जिट बूथ के पास करीब 10 इंच ऊंचा स्पीड ब्रेकर उनकी कोशिश पर पानी फेर देता है और मजबूरन उन्हें पैसे देने पड़ते हैं।
मध्य रेल के नागपुर मंडल के वरिष्ठ वाणिज्य मंडल प्रबंधक अमन मित्तल ने कहा कि एग्जिट पॉइंट पर भुगतान फास्ट टैग से होगा। नकद भुगतान करने पर वाहन चालक को अंतिम रसीद देना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो इसकी जांच की जाएगी।
रेल मंत्री अश्विनी कुमार की तरफ से 'नो बिल, नो पेमेंट' की नीति शुरू की गई है। इसका मकसद रेल उपभोक्ताओं के मन में पारदर्शिता का भाव लाना है और इसे पूरे देश में गंभीरता से लागू किया गया है। स्टेशनों पर फूड और वाटर स्टॉल के अलावा ट्रेनों में बिकने वाले खाने-पीने और बाकी सभी सामान के लिए यह नियम अनिवार्य है। यात्री बिल मांगे तो ठेकेदार को देना ही होगा। लेकिन नागपुर स्टेशन परिसर की पार्किंग में इसका पालन नहीं हो रहा।
आदेश न मानने पर धारा 72 के तहत कम से कम 1 महीने से लेकर 3 वर्ष तक की कैद हो सकती है। जुर्माना कम से कम 25,000 रुपये से लेकर 1,00,000 रुपये तक का है। आयोग हालात के हिसाब से जेल और जुर्माना, दोनों एक साथ भी लगा सकता है। आदेश लागू कराने के लिए उपभोक्ता आयोग के पास प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियां होती हैं, जिसके तहत वह आरोपी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी कर सकता है।
भारतीय न्याय संहिता के हिसाब से देखें तो रसीद वापस लेना सुनियोजित तरीके से सबूत मिटाने और राजस्व चोरी की कोशिश है। धारा 318 धोखाधड़ी की है, यानी गलत नीयत से पैसे लेकर सबूत छिपाना। धारा 351/115 धमकी या बल प्रयोग की है, जिसमें रसीद दिखाने पर अभद्रता करना आता है। ऐसे मामलों में पुलिस ठेकेदार या उसके कर्मचारियों पर आपराधिक धाराओं में केस दर्ज कर सकती है, जिसमें आर्थिक दंड और जेल का प्रावधान भी हो सकता है।
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