नागपुर में पितृपक्ष के दौरान बैठता है मस्कर्या गणपति, 239 साल पुरानी है परंपरा
नागपुर के भोसले राजघराने से जुड़ा मस्कर्या गणपति उत्सव आम गणेशोत्सव के बाद पितृपक्ष में मनाया जाता है।
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गणेशोत्सव का नाम आते ही भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी पर खत्म होने वाला उत्सव याद आता है। लेकिन नागपुर की सांस्कृतिक परंपरा में एक गणेशोत्सव ऐसा भी है, जो आम गणेशोत्सव के बाद पितृपक्ष में मनाया जाता है। यह मस्कऱ्या गणपति है, जिसे हाडपक्या गणपति के नाम से भी जाना जाता है। इस उत्सव का इतिहास पूरे 239 साल पुराना है।
नागपुर के भोसले राजघराने से जुड़ी यह परंपरा सिर्फ धार्मिक श्रद्धा की नहीं है। इसमें इतिहास, राजवैभव, लोककला और सामाजिक जीवन का संगम दिखता है। वक्त बदला, उत्सव का रूप बदला और नागपुर शहर भी फैल गया, फिर भी पितृपक्ष के इस गणेशोत्सव की परंपरा आज भी निभाई जा रही है।
बताया जाता है कि मस्कऱ्या गणपति के इतिहास की शुरुआत सन 1787 में हुई। नागपुर के तत्कालीन राजा श्रीमंत खंडोजी महाराज भोसले, यानी चिमणाबापू, बंगाल की स्वारी पर गए थे। इस मोहिम में जीत हासिल करने के बाद वे नागपुर लौटे।
जब वे लौटे तब तक भाद्रपद का आम गणेशोत्सव खत्म हो चुका था। गणपति की स्थापना और विसर्जन दोनों हो चुके थे। राजा को गणेशोत्सव छूट जाने का मलाल था, और साथ ही बंगाल की जीत की खुशी भी मनानी थी। राजपुरोहितों की सलाह से इन दोनों भावनाओं को एक साथ जोड़ने का फैसला हुआ। आम गणेशोत्सव का समय बीत चुका था, फिर भी पितृपक्ष में गणपति की स्थापना कर उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई। आगे चलकर यही उत्सव नागपुर के सांस्कृतिक इतिहास का एक अलग अध्याय बन गया।
इस उत्सव की एक खासियत इसका नाम भी है। बताया जाता है कि उस दौर में उत्सव के मौके पर सिर्फ धार्मिक कार्यक्रम नहीं होते थे। लोगों के मनोरंजन के लिए नकला, लावणी, पोवाडे, खडी गंमत और अलग-अलग लोककलाओं के कार्यक्रम भी रखे जाते थे। इन कार्यक्रमों में विनोद, हंसी-ठिठोली और मनोरंजन की खास जगह थी। इसी 'मस्करी' की परंपरा से इस गणपति का नाम 'मस्कऱ्या गणपति' पड़ा, ऐसा बताया जाता है।
दूसरी तरफ, विदर्भ की बोली में पितृपक्ष को 'हाडपक' कहा जाता है। इसलिए इस दौरान बैठने वाले गणपति को 'हाडपक्या गणपति' भी कहा जाता है। यानी एक ही गणपति के दो नाम हैं।
आम तौर पर गणेशोत्सव भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी को शुरू होता है। मस्कऱ्या गणपति की स्थापना भाद्रपद कृष्ण पक्ष में, यानी पितृपक्ष में होती है। इसी वजह से यह उत्सव नागपुर की गणेशोत्सव परंपरा में अलग पहचान रखता है। आम तौर पर भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी के आसपास इस ऐतिहासिक गणपति की स्थापना की जाती है। उत्सव कुछ दिन चलता है और फिर महाप्रसाद व दूसरे धार्मिक कार्यक्रमों के बाद विसर्जन के साथ खत्म होता है। आम गणेशोत्सव की धूमधाम थमने के बाद नागपुर में एक बार फिर गणेशभक्ति और उत्साह का माहौल बन जाता है।
इस उत्सव का मूल केंद्र नागपुर के सीनियर भोसले राजवाड़े के महाल परिसर से जुड़ा है। राजघराने के दौर में शुरू हुई यह परंपरा आगे अलग-अलग रूपों में चलती रही। राजशाही का दौर खत्म हुआ, सामाजिक हालात बदले और शहर की जिंदगी में आधुनिकता आई, फिर भी इस उत्सव का ऐतिहासिक महत्व कम नहीं हुआ। बदलते वक्त में परंपरा को संभालकर रखने का काम और अहम हो गया। बताया जाता है कि आज यह उत्सव 'महाराजा ऑफ नागपुर ट्रस्ट' के जरिए आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि भोसले राजघराने से जुड़ी यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे।
मस्कऱ्या गणपति की मूर्ति भी इस उत्सव का आकर्षण रही है। बताया जाता है कि पहले इस गणपति की मूर्ति 18 हाथों की और करीब 21 फुट ऊंची होती थी। 2005 के बाद मूर्ति की ऊंचाई कम कर दी गई है। मूर्ति की भव्यता सिर्फ देखने की चीज नहीं है, इसके पीछे करीब ढाई सदी का इतिहास खड़ा है। इसलिए मूर्ति के सामने खड़े होने पर भक्ति के साथ उस दौर के राजघराने, उनके धार्मिक जीवन और तब के नागपुर की सांस्कृतिक परंपरा की भी याद आती है।
गणपति और पितृपक्ष का रिश्ता आम तौर पर रोज के उत्सवों के संदर्भ में नहीं देखा जाता। इसलिए पितृपक्ष में गणपति की स्थापना का विचार ही इस उत्सव को अलग बनाता है।