मंगलवार 29 सितंबर को अंगारकी संकष्टी चतुर्थी और भरणी श्राद्ध साथ, जानें पूजा विधि
इस बार एक ही दिन गणपति की उपासना और पितरों के श्राद्ध का योग बना है।
हिंदू पंचांग में कुछ तारीखों को खास धार्मिक अहमियत दी जाती है। जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे 'अंगारकी संकष्टी चतुर्थी' कहा जाता है। इस बार यह तारीख मंगलवार, 29 सितंबर को आ रही है। इसी दिन पितृपक्ष में भरणी नक्षत्र पर होने वाला श्राद्ध भी पड़ रहा है, जिसे 'भरणी श्राद्ध' कहते हैं। यानी एक ही दिन गणपति की पूजा और पूर्वजों को याद करने वाला श्राद्ध विधि, दोनों साथ आ गए हैं।
संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित तिथि मानी जाती है। किसी महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी अगर मंगलवार को पड़े, तो उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन गणपति की भक्तिभाव से पूजा और उपवास करने से विघ्न दूर होते हैं। 'अंगारकी' नाम मंगलवार और गणेश से जुड़ी धार्मिक परंपरा से निकला है, और कई जगहों पर इस दिन गणेश की खास आराधना करने की प्रथा है।
पूजा विधि की बात करें तो सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनने चाहिए। गणपति के सामने दिया और धूप जलाकर पूजा की जाती है। गणपति को दूर्वा, लाल फूल और नैवेद्य चढ़ाया जाता है। कुछ भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और चंद्रोदय के बाद गणपति की पूजा करके व्रत खोलते हैं। हालांकि पूजा का तरीका परिवार और इलाके की परंपरा के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है।
दूसरी तरफ, पितृपक्ष में भरणी नक्षत्र पर होने वाले श्राद्ध को भरणी श्राद्ध कहा जाता है। इस दिन दिवंगत पूर्वजों को याद करके श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। कुछ परंपराओं में भरणी श्राद्ध को खास महत्व दिया जाता है। इस दिन पूर्वजों की याद में तर्पण, पिंडदान और अन्नदान करने की परंपरा है। कई परिवारों में ब्राह्मण भोजन कराने या जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाने का रिवाज भी देखा जाता है।
श्राद्ध विधि करते वक्त संबंधित व्यक्ति की मृत्यु की तारीख, पंचांग में नक्षत्र और परिवार की परंपरा का ध्यान रखा जाता है। इसलिए सही विधि के लिए स्थानीय पंचांग या पुरोहित से सलाह लेना ठीक रहता है।
अंगारकी संकष्टी चतुर्थी और भरणी श्राद्ध, दोनों का मकसद और विधि अलग-अलग है। एक गणपति की उपासना से जुड़ी है तो दूसरा पितरों की याद से। अगर दोनों एक ही दिन आ जाएं, तो गणपति की पूजा और श्राद्ध विधि का समय व तरीका परिवार की परंपरा के मुताबिक तय किया जा सकता है। धार्मिक विधियों के समय के बारे में स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना ठीक माना जाता है। मान्यता है कि अंगारकी संकष्टी पर गणपति की आराधना करने से संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं, वहीं भरणी श्राद्ध के जरिए पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जताई जाती है।