पितृपक्ष में श्राद्ध का खाना कौवे को ही क्यों खिलाते हैं, जानिए परंपरा
पितृपक्ष में श्राद्ध का अन्न कौवे को क्यों दिया जाता है, इसके पीछे की मान्यता और पौराणिक कथा।
पितृपक्ष में पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। श्राद्ध के लिए खाना तैयार होता है और उसे ब्राह्मणों को अर्पित किया जाता है। इस अन्न के पाँच हिस्से अलग-अलग जीवों और देवताओं को चढ़ाए जाते हैं। इसे पंचबली श्राद्ध कहा जाता है।
पंचबली श्राद्ध गाय, कुत्ता, कौवा, देवता और चींटी को अर्पित किया जाता है। इन पाँचों में कौवे को खिलाना खास अहमियत वाला माना जाता है। धार्मिक श्रद्धा के मुताबिक कौवे को खिलाए बिना श्राद्ध पूरा नहीं माना जाता।
इस बार पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हुई है। उसी दिन पौर्णिमा का श्राद्ध किया गया। पितृपक्ष 10 अक्टूबर को खत्म होगा, यानी सर्वपित्री अमावस्या के दिन इसका समापन होगा। इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान अहम माने जाते हैं। सवाल यह है कि सिर्फ कौवे को ही क्यों खिलाया जाता है, किसी और पक्षी को क्यों नहीं।
श्राद्ध का खाना कौवे को क्यों देते हैं, इसका जवाब धार्मिक श्रद्धा में मिलता है। पितृपक्ष में ब्राह्मणों को खिलाने के साथ कौवों को भी खिलाया जाता है। धार्मिक श्रद्धा के अनुसार कौवों को पूर्वजों का दूत माना जाता है। कहा जाता है कि पितृपक्ष में कौवों को खिलाने से वह सीधे पूर्वजों तक पहुँचता है। यह भी माना जाता है कि पितृपक्ष में पूर्वज कौवों के रूप में श्राद्ध का अन्न स्वीकार करते हैं। एक और मान्यता यह है कि यमराज ने कभी कौवों को एक वरदान दिया था। कौवों को खिलाने से पूर्वजों की आत्माओं को शांति मिलती है।
इसके पीछे की पौराणिक कथा रामायण काल की एक आख्यायिका से जुड़ी है। इसके मुताबिक भगवान इंद्र का बेटा जयंत एक बार पृथ्वी पर कौवे के रूप में रह रहा था। कौवे के रूप में जयंत ने सीता को चोंच मारी, जिससे उनके पैर से खून बहने लगा। इससे नाराज होकर भगवान राम ने घास के बाण से उस कौवे की आँख पर वार किया।
बाद में कौवे ने पछतावा करते हुए माफी माँगी, तो भगवान राम ने उसे माफ कर दिया। प्रभु राम ने कौवों को वरदान दिया कि पितृपक्ष में उन्हें खिलाने पर यह अन्न सीधे उनके पूर्वजों तक पहुँचेगा। माना जाता है कि तभी से कौवों को खिलाने की यह परंपरा शुरू हुई।
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