मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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18:21 IST

गया के जनार्दन मंदिर में जीते जी अपना पिंडदान, तीन दिन चलता है आत्म श्राद्ध

बिहार के गया शहर के जनार्दन मंदिर में जीवित व्यक्ति अपना पिंडदान कर सकता है। तीन दिन चलने वाले इस आत्म श्राद्ध में दही और चावल के तीन पिंड अर्पित किए जाते हैं।

गया के जनार्दन मंदिर में जीते जी अपना पिंडदान, तीन दिन चलता है आत्म श्राद्ध
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

पितृपक्ष का पखवाड़ा चल रहा है। आम तौर पर यही सुनने में आता है कि इंसान की मौत के बाद उसका श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। पूर्वजों को शांति मिले और उनके प्रति कृतज्ञता जताई जाए, इसलिए पितृपक्ष में उन्हें तर्पण किया जाता है। लेकिन भारत में एक मंदिर ऐसा भी है, जहां जीवित व्यक्ति खुद अपना पिंडदान कर सकता है। सुनने में यह थोड़ा अजीब लगता है, मगर बात उतनी ही सच है।

यह मंदिर बिहार के गया शहर में है। बताया गया है कि यहां यह परंपरा हजारों साल से चली आ रही है। गया को पितरों की नगरी के तौर पर जाना जाता है। देश और विदेश से लाखों लोग यहां अपने पूर्वजों का पिंडदान करने आते हैं। इसी शहर में भस्मकूट पर्वत पर जनार्दन मंदिर है। यह माता मंगलागौरी मंदिर के ठीक उत्तर में है और भगवान विष्णु के स्वरूप को समर्पित है।

गया की 54 पिंडवेदियों में से यह एक अहम वेदी मानी जाती है। यहीं जीवित व्यक्ति अपने लिए पिंडदान करता है। इसे 'आत्म पिंडदान' या 'आत्म श्राद्ध' कहते हैं। कहा गया है कि भारत में यह अकेली जगह है, जहां जीते जी अपना पिंडदान किया जा सकता है।

अब सवाल उठता है कि कोई जीते जी अपना पिंडदान क्यों करे। इसके पीछे एक बड़ी वजह बताई गई है। जिन लोगों के बच्चे नहीं हैं और जिनके बाद श्राद्ध करने वाला कोई वारिस नहीं है, वे यहां आकर खुद अपना पिंडदान करते हैं, ताकि मरने के बाद उनकी आत्मा को भटकना न पड़े और मोक्ष मिले। जो लोग संन्यासी हैं और जिन्होंने संसार छोड़ दिया है, वे भी यहां आत्म पिंडदान करते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि आत्मा की मुक्ति के लिए यह विधि जीवित रहते ही कर लेनी चाहिए, इसलिए वे श्रद्धा से यहां आते हैं।

यह विधि एक घंटे की नहीं है। आत्म श्राद्ध की प्रक्रिया पूरे तीन दिन चलती है। वायु पुराण के मुताबिक गया में भगवान जनार्दन खुद पितृ रूप में हैं। उनके दर्शन भर से तीन ऋणों से मुक्ति मिलती है। इसी वजह से यहां किया गया श्राद्ध सीधे विष्णु पूजा जितना पवित्र माना जाता है।

पहले दिन संकल्प लिया जाता है। दूसरे दिन प्रायश्चित्त, तप, जप, मंत्रोच्चार और पूजा होती है। तीसरे दिन पिंड अर्पित किया जाता है। इस विधि में वायु पुराण के आत्म श्राद्ध के श्लोक पढ़े जाते हैं। फिर दही और चावल से तीन पिंड बनाए जाते हैं। खास बात यह है कि इन पिंडों में तिल का इस्तेमाल नहीं होता। आम श्राद्ध में तिल लगता है, पर आत्म पिंडदान में नहीं।

ये तीन पिंड भगवान जनार्दन के दाहिने हाथ पर अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि व्यक्ति जीते जी जो पिंडदान करता है, उसे भगवान जनार्दन खुद संभालकर रखते हैं। जब उस व्यक्ति की मृत्यु होती है, तब भगवान जनार्दन खुद वे पिंड विष्णुपद पर अर्पित करते हैं। इससे उसकी आत्मा को सीधे विष्णुलोक में जगह मिलती है और मोक्ष प्राप्त होता है।

जनार्दन भगवान विष्णु का ही एक नाम है। विष्णु का धाम मुक्तिधाम है और उनके चरणों में पहुंची आत्मा को मोक्ष मिलता है, ऐसी मान्यता है। गया नगरी का रिश्ता गयासुर नाम के राक्षस की कथा से भी जोड़ा जाता है। हर साल पितृपक्ष में, जो भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा से सर्वपितृ अमावस्या तक रहता है, इस मंदिर में आत्म पिंडदान के लिए काफी भीड़ होती है। हजारों साल से चली आ रही यह अनोखी परंपरा आज भी उसी श्रद्धा से निभाई जाती है।

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