नागपुर खंडपीठ ने तपन जायसवाल पर साहूकारी का केस खत्म किया, FIR और चार्जशीट रद्द
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने व्यापारी तपन जायसवाल के खिलाफ साहूकारी कानून के तहत दर्ज FIR, चार्जशीट और निचली अदालत की कार्यवाही रद्द कर दी।
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नागपुर के चर्चित साहूकारी मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने व्यापारी तपन जायसवाल को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर, दाखिल चार्जशीट और निचली अदालत में चल रही आपराधिक कार्यवाही, तीनों को रद्द कर दिया। आदेश में साफ कहा गया कि कानून के प्रावधानों और तय प्रक्रिया का पालन किए बिना आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सुनवाई में अदालत ने संबंधित कानून के प्रावधानों, अपराध दर्ज करने में हुई देरी और पुलिस की जांच के तरीके पर गौर किया।
मामला शिकायतकर्ता विमल दिनेश कालमेघ की शिकायत पर प्रतापनगर पुलिस थाने में महाराष्ट्र साहूकारी (विनियमन) अधिनियम के तहत दर्ज हुआ था। तपन जायसवाल ने इस एफआईआर और उसके आधार पर दाखिल चार्जशीट को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी और आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुबोध धर्माधिकारी और अधिवक्ता समीर सोनवने ने पैरवी की। बचाव पक्ष ने मामले के तथ्य, कानून के प्रावधान और आपराधिक प्रक्रिया की खामियां अदालत के सामने रखीं।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि दिसंबर 2013 में उनके बेटे राहुल कालमेघ ने मकान बनाने के लिए तपन जायसवाल से 2 लाख 50 हजार रुपये उधार लिए थे। शिकायत के मुताबिक इस लेन-देन पर 17.5 प्रतिशत सालाना ब्याज तय हुआ था। आरोप यह भी था कि मूल रकम में से 35 हजार रुपये ब्याज के नाम पर काट लिए गए और 2 लाख 15 हजार रुपये दिए गए।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि बाद में मूल रकम और ब्याज की वसूली के लिए दबाव डाला गया। मारपीट, पिस्टल दिखाकर धमकाने और जबरन प्लॉट की रजिस्ट्री करवाने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए थे। इन्हीं के आधार पर पुलिस ने शुरू में भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं और आर्म्स एक्ट के तहत कार्रवाई की थी। मामले के उपलब्ध विवरण के मुताबिक जांच में इन आरोपों के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले, तो पुलिस ने ये धाराएं हटा दीं। उसके बाद महाराष्ट्र साहूकारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत चार्जशीट दाखिल हुई।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से समयसीमा और जांच की वैधता का मुद्दा जोर देकर उठाया गया। अदालत ने पाया कि कथित आखिरी घटना 21 मार्च 2015 की बताई गई थी, जबकि एफआईआर 31 जुलाई 2020 को दर्ज हुई। यानी शिकायत में पांच साल से ज्यादा की देरी हुई थी।
लाइसेंस का मुद्दा भी अहम रहा। अदालत ने महाराष्ट्र साहूकारी (विनियमन) अधिनियम, 2014 की धारा 39 के तहत लगे आरोपों को देखते हुए याचिकाकर्ता के लाइसेंस के तथ्य को महत्वपूर्ण माना। आदेश के मुताबिक संबंधित अवधि में याचिकाकर्ता के पास सक्षम प्राधिकारी का जारी किया हुआ वैध साहूकारी लाइसेंस था। ऐसे में बिना लाइसेंस साहूकारी करने का अपराध बनता ही नहीं था। साहूकारी कानून में अपराध साबित करने के लिए सिर्फ शिकायत के आरोप काफी नहीं होते। उस समय लागू कानून, लाइसेंस की स्थिति और अपराध के जरूरी कानूनी तत्वों की जांच भी जरूरी है।
उत्पीड़न के आरोप साहूकारी अधिनियम की धारा 45 के तहत लगे थे। इस पर हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 468 को भी देखा। कथित आखिरी घटना मार्च 2015 की थी और शिकायत जुलाई 2020 में दर्ज हुई। आदेश में बताए गए कानूनी विश्लेषण के मुताबिक दो साल तक की सजा वाले अपराधों में संज्ञान लेने की आम समयसीमा तीन साल है। एफआईआर दर्ज होने तक काफी वक्त बीत चुका था, इसलिए अपराध की प्रकृति, सजा के प्रावधान और संज्ञान की सीमा को ध्यान में रखना जरूरी था।
पुलिस की जांच का पहलू भी सामने आया। हाईकोर्ट ने कहा कि साहूकारी अधिनियम की धारा 43, 44 और 46 के तहत ये अपराध गैर-संज्ञेय श्रेणी में आते हैं। ऐसे अपराधों में जांच शुरू करने से पहले पुलिस को CrPC की धारा 155(2) के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होती है। सवाल यह था कि क्या यह अनुमति लिए बिना जांच हुई। कानून के मुताबिक जरूरी अनुमति के बिना की गई जांच पूरी कार्यवाही की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े कर सकती है।
सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल का भी जिक्र आया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बताया है कि किन हालात में एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है। सामान्य सिद्धांत यह है कि जहां आरोपों और उपलब्ध सामग्री से अपराध के जरूरी तत्व नहीं बनते, या कार्यवाही कानून के साफ प्रावधानों के खिलाफ है, वहां हाईकोर्ट अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है। हर मामले का फैसला उसके अपने तथ्यों और लागू कानून पर होता है।
तपन जायसवाल के मामले में लाइसेंस, एफआईआर में देरी और जांच के लिए जरूरी अनुमति जैसे मुद्दों पर गौर किया गया। इन सबको साथ देखकर अदालत ने याचिका मंजूर की। हाईकोर्ट ने सिर्फ एफआईआर और चार्जशीट ही नहीं, बल्कि 11वें संयुक्त सिविल जज, कनिष्ठ स्तर तथा प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने लंबित आपराधिक मामले की कार्यवाही भी रद्द कर दी।
यह मामला लंबे समय से विवाद में था। शुरू में गंभीर आरोप लगे थे, पर आखिर में साहूकारी अधिनियम की धाराओं में ही चार्जशीट दाखिल हुई थी। इस फैसले से साफ है कि शिकायत पर आपराधिक कार्रवाई शुरू हो जाने के बाद भी पुलिस और अभियोजन को कानून की तय प्रक्रिया माननी ही होगी। अपराध की प्रकृति, जांच की अनुमति और समयसीमा को नजरअंदाज करके कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि कानून की तय प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी पर आपराधिक मामला चलाना उचित नहीं है।
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