नागपुर के वीडियो ब्लॉगर फारिस कादरी तहसील थाना मामले में बरी, कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
नागपुर की अदालत ने सोशल मीडिया वीडियो ब्लॉगर फारिस कादरी को जून 2024 के तहसील पुलिस स्टेशन वाले मामले में सभी आरोपों से बरी कर दिया।
नागपुर की एक अदालत ने सोशल मीडिया वीडियो ब्लॉगर फारिस कादरी को जून 2024 में तहसील पुलिस स्टेशन में हुई कथित घटना से जुड़े सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत के फैसले में उनका नाम फारिस निजामुद्दीन कादरी दर्ज है। कोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ दिया और कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।
यह फैसला 29 अक्टूबर 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-20 पंकज एस. पांडे ने सेशंस केस नंबर 695/2025 में सुनाया।
मामला तहसील पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 355/2024 से शुरू हुआ था। यह केस 8 जून 2024 की तड़के हुई कथित घटना को लेकर दर्ज किया गया था। कादरी पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 353, 186, 504 और 427 के साथ सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 की धारा 3 के तहत आरोप लगे थे। आरोपों में सरकारी कर्मचारी पर आपराधिक बल का इस्तेमाल, सरकारी अधिकारियों के काम में बाधा, जानबूझकर अपमान और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना शामिल था।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक फारिस कादरी एक दोस्त के साथ तहसील पुलिस स्टेशन गए थे। आरोप था कि वहां उन्होंने शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया में दखल दिया, कागज छीने और पुलिसकर्मियों को गालियां दीं। अभियोजन का यह भी आरोप था कि दूसरे कमरे में ले जाए जाने के बाद उन्होंने कुर्सी दीवार पर लगे टीवी स्क्रीन और कंप्यूटर की तरफ फेंकी, जिससे सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा। उपकरणों की अनुमानित कीमत करीब 1.20 लाख रुपए बताई गई थी।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने सात गवाह पेश किए, जबकि बचाव पक्ष की तरफ से एक गवाह की गवाही हुई। मौखिक और दस्तावेजी सबूतों को परखने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि आरोप भरोसेमंद सबूतों से साबित नहीं होते।
सरकारी कर्मचारी पर हमले या आपराधिक बल के आरोप पर अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता के खिलाफ कादरी ने ऐसा कुछ किया, यह अभियोजन साबित नहीं कर सका। कागज छीनने के आरोप भी अदालत को अनिश्चित लगे। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस स्टेशन की सीसीटीवी फुटेज सुनवाई में पेश ही नहीं की गई, जबकि वह स्टेशन के अंदर असल में क्या हुआ, यह अलग से साबित करने में अहम भूमिका निभा सकती थी।
IPC की धारा 186 के आरोप पर अदालत ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेना दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के तहत वर्जित है। इस कानूनी अड़चन के अलावा अभियोजन यह भी साबित नहीं कर पाया कि कादरी ने सरकारी कर्मचारियों को उनकी ड्यूटी के दौरान सचमुच रोका था। धारा 504 के तहत जानबूझकर अपमान के आरोप पर कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने कौन से गाली-भरे शब्द कहे, यह साबित नहीं हुआ। साथ ही वे हालात भी साबित नहीं हुए, जिनसे यह दिखे कि अपमान से सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका थी।
सरकारी संपत्ति के नुकसान वाला हिस्सा अभियोजन की सबसे कमजोर कड़ियों में से एक रहा। अभियोजन का दावा था कि पुलिस स्टेशन में लगे टीवी स्क्रीन और कंप्यूटर को नुकसान पहुंचा, लेकिन जांच के दौरान न तो ये दोनों उपकरण जब्त किए गए और न ही अदालत में पेश हुए। उपकरण चालू रहे और इस्तेमाल में आते रहे, यह सफाई नुकसान की असल प्रकृति या हद साबित नहीं करती। कथित आर्थिक नुकसान को साबित करने वाले रिकॉर्ड भी पेश नहीं किए गए।
अभियोजन की तरफ से दिए गए फोटो भी विचार से बाहर रखे गए, क्योंकि उन्हें ठीक से साबित नहीं किया गया था। फोटोग्राफर की गवाही नहीं हुई और इलेक्ट्रॉनिक सबूत के लिए जरूरी प्रमाणपत्र भी जमा नहीं किया गया। मरम्मत का कोटेशन जारी करने वाले व्यक्ति से भी अदालत में पूछताछ नहीं हुई। कोर्ट ने कहा कि FIR में बताए गए 1.20 लाख रुपए उपकरणों की बताई गई कीमत हैं, सुनवाई में साबित हुआ असल नुकसान नहीं। नुकसान के सिलसिले में बताया गया 38,500 रुपए का आंकड़ा भी पर्याप्त सबूत से समर्थित नहीं था।
अभियोजन को एक और झटका तब लगा जब मौके का पंच गवाह उसके पक्ष में नहीं बोला। गवाह ने इनकार किया कि घटनास्थल पर उसकी मौजूदगी में पंचनामा तैयार हुआ था। इससे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान के सबूत और कमजोर पड़ गए।
सबूतों और कानूनी दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने फारिस कादरी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। फैसले में साफ किया गया कि बरी करने का आधार सबूतों की कमी और अभियोजन के केस में कानूनी खामियां हैं। यह इस बात का निष्कर्ष नहीं है कि मूल आरोप झूठे या तंग करने वाले थे।
कोर्ट ने कादरी के मौजूदा जमानत बॉन्ड रद्द कर दिए और जमानतदार को मुक्त कर दिया। हालांकि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 481 के तहत उन्हें 25,000 रुपए का बॉन्ड एक जमानतदार के साथ भरने का निर्देश दिया गया, ताकि जरूरत पड़ने पर वे छह महीने तक ऊपरी अदालत में हाजिर रहें। कार्यवाही के दौरान फारिस कादरी की तरफ से एडवोकेट मीर नगमन अली ने पैरवी की। इस फैसले के साथ 2024 के तहसील पुलिस स्टेशन मामले की सुनवाई खत्म हो गई।
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