नागपुर के चौराहों पर ऑटो की मनमानी, स्मार्ट सिटी के दावों के बीच रोज लग रहा जाम
सीताबर्डी से इतवारी और महल से मेडिकल चौक तक ऑटो रिक्शा चौराहों और लेन पर कब्जा जमाए रहते हैं। अधिकृत स्टैंड की कमी और निगरानी के अभाव पर सवाल उठ रहे हैं।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
नागपुर को स्मार्ट सिटी कहा जाता है, लेकिन सड़कों पर ऑटो रिक्शा की मनमानी जस की तस है। कहीं चौराहे पर कब्जा है, कहीं सड़क के बीच सवारी भरने की होड़ लगी है, तो कहीं एक पूरी लेन रोककर ऑटो खड़े हैं। सीताबर्डी से इतवारी और महल से मेडिकल चौक तक यही नजारा दिखता है, और यही शहर की ट्रैफिक व्यवस्था की पोल खोल रहा है।
सवाल यह उठ रहा है कि करोड़ों रुपये खर्च करके सड़कें और फ्लाईओवर बनाने वाले तंत्र के पास ऑटो खड़े करने के लिए अधिकृत स्टैंड तक नहीं हैं क्या? अगर स्टैंड हैं, तो सड़कों पर अवैध अड्डे क्यों चल रहे हैं? मुद्दा ऑटो के होने का नहीं है। मुद्दा उनकी बेलगाम मनमानी और प्रशासन की ढिलाई का है।
ऑटो और ई-रिक्शा सार्वजनिक परिवहन का अहम हिस्सा हैं। यात्रियों को घर से मुख्य सड़क, बाजार और स्टेशन तक पहुंचाने में उनकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन सुविधा के नाम पर सड़क पर कब्जे की छूट भी नहीं दी जा सकती।
अधिकृत स्टैंड और तय पिकअप प्वाइंट की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। इसलिए चालक अपनी सुविधा से जहां मन आए, वहीं गाड़ी खड़ी कर देते हैं। ऐसे में नागपुर महानगरपालिका, परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। स्टैंड की जरूरत का आकलन कौन करेगा, जगह कौन तय करेगा और नियमों का पालन कौन कराएगा? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, चौराहों पर अव्यवस्था खत्म होने की उम्मीद करना बेमानी है।
सीताबर्डी, इतवारी, महल, मेडिकल चौक, कॉटन मार्केट, सीर रोड, छत्रपति चौक, मानेवाड़ा, शताब्दी चौक, तुकडोजी पुतला, सक्करदरा, नंदनवन और रानी झांसी चौक जैसे व्यस्त इलाकों में ऑटो चालक अपनी मर्जी से गाड़ी खड़ी करके सवारियां भरते हैं। चौराहों के मुहाने पर अचानक ब्रेक लगाना, सड़क के बीचोबीच रुक जाना और एक लेन पर कब्जा कर लेना गाड़ियों की रफ्तार रोक देता है। सिग्नल हरा होने पर भी वाहन फंसे रहते हैं और देखते ही देखते लंबी कतारें लग जाती हैं।
सड़क सबकी है या ऑटो चालकों का निजी स्टैंड, यह सवाल रोज जाम में फंसने वाले नागरिकों का है। नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जिम्मेदारी ट्रैफिक पुलिस की है, लेकिन सड़क पर दिखती मनमानी उस कार्रवाई के असर पर सवाल खड़े करती है।
शहर में ऑटो और ई-रिक्शा की संख्या बढ़ रही है और उसके साथ ट्रैफिक कंट्रोल की चुनौती भी बड़ी होती जा रही है। गलत दिशा से गाड़ी निकालना, अचानक कट मारना, चौराहों पर सवारी उतारना और बिठाना, और क्षमता से ज्यादा यात्रियों को बैठाना, ये सब दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ाते हैं। सवारी पकड़ने की होड़ में चालकों के बीच झगड़े भी होते हैं।
इसका खामियाजा दोपहिया चालकों और पैदल चलने वालों को भुगतना पड़ता है। खासकर व्यस्त चौराहों पर अचानक रुकने वाले ऑटो पीछे से आ रही गाड़ियों के लिए खतरा बन जाते हैं। सवाल यह भी है कि नियमित निगरानी के बिना ट्रैफिक में अनुशासन कैसे आएगा।
स्मार्ट सिटी की पहचान सिर्फ सीमेंट की सड़कों और फ्लाईओवर की ऊंचाई से नहीं होती, सड़कों की ट्रैफिक व्यवस्था से भी होती है। जब हर चौराहे पर ऑटो की मनमानी और हर रास्ते पर जाम लोगों की परेशानी बना हुआ हो, तो विकास के दावों पर सवाल उठना तय है।
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