नागपुर का डेंटल सुपरस्पेशलिटी अस्पताल तैयार, फिर भी शुरू नहीं; फडणवीस ने दी 3 महीने की मोहलत
नागपुर में इमारत और 80 फीसदी उपकरण तैयार होने के बावजूद डेंटल सुपरस्पेशलिटी अस्पताल शुरू नहीं हुआ है।
नागपुर के मेडिकल कॉलेज परिसर में शासकीय दंत महाविद्यालय व अस्पताल के तहत डेंटल सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल व रिसर्च सेंटर की इमारत बनकर तैयार हो चुकी है। यह 5 मंजिला इमारत मेडिकल डीन कार्यालय के सामने 4,770.12 वर्गमीटर में खड़ी है। इसमें लगने वाले 80 फीसदी उपकरण भी आ चुके हैं। फिर भी अस्पताल अब तक शुरू नहीं हो पाया है।
प्रकल्प में डेढ़ वर्ष की देरी हो चुकी है। अब मुख्यमंत्री फडणवीस को दखल देना पड़ा है और काम पूरा करने के लिए फिर से 3 महीने की नई डेडलाइन मिली है। इमारत का भूमिपूजन 4 जनवरी 2019 को मुख्यमंत्री फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के हाथों हुआ था।
नये अस्पताल के लिए कुल 91 पदों में से 60 भरे जा चुके हैं। अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं देने के लिए डीपीसी के तहत करीब 3.89 करोड़ रुपये की उपकरण खरीद को प्रशासनिक मंजूरी दी गई थी। इसके अलावा राज्य योजना के तहत करीब 3.43 करोड़ रुपये की निधि भी मंजूर हुई है।
इस निधि से उपकरण आ गए हैं, और बाकी 20 फीसदी उपकरण कुछ ही दिनों में मिल जाएंगे। लेकिन अब तक इन उपकरणों को लगाया नहीं गया है। उपकरण न लगने की वजह से कमरों में उनसे जुड़ी बिजली फिटिंग का काम भी बाकी है, और बिजली फिटिंग के बिना उपकरण चलाए नहीं जा सकते।
मुख्यमंत्री फडणवीस ने अधिकारियों को फटकार लगाई तो वैद्यकीय संचालक भी हरकत में आ गए हैं। बताया गया है कि वे जल्द ही दौरा कर हालात की जानकारी लेने वाले थे। हालांकि वैद्यकीय संचालक इससे पहले भी मेडिकल आए थे, लेकिन उन्होंने भी डेंटल सुपरस्पेशलिटी की तरफ ध्यान नहीं दिया। यानी लापरवाही अधिष्ठाता से लेकर वैद्यकीय संचालक स्तर तक हुई है।
देरी का असर दो जगह दिख रहा है। प्रकल्प में देरी से उपकरणों की कीमत चढ़ गई है। जिन मरीजों को सुपरस्पेशलिटी इलाज मिलना था, उन्हें और कुछ दिन इंतजार करना पड़ेगा। अस्पताल शुरू होने से हर विभाग में पीजी की 3-3 सीटें बढ़ने वाली थीं, लेकिन यह काम भी अब एक वर्ष बाद ही हो सकेगा। नये अस्पताल के बाद स्नातकोत्तर की सीटें दोगुनी यानी 44 तक होने की उम्मीद है, जो फिलहाल 21 (प्रथम वर्ष) हैं।
आम तौर पर कई प्रोजेक्ट निधि की कमी से लेट होते हैं, लेकिन यहां उलटा हुआ है। निधि भी मिली और उपकरण भी, मगर अधिष्ठाता की तरफ से गंभीरता नहीं दिखाए जाने के कारण अस्पताल अब तक शुरू नहीं हो सका।
बताया जाता है कि तत्कालीन अधिष्ठाता डॉ. अभय दातारकर ने पूरी सक्रियता से काम किया था। उनके तबादले के बाद प्रभारी अधिष्ठाता जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। प्रभारी अधिष्ठाता ने शुरुआत से ही प्रकल्प में रुचि नहीं दिखाई। करीब 2 महीने बाद उन्होंने सार्वजनिक निर्माण विभाग के साथ बैठक ली, और वह बैठक भी इसलिए हुई क्योंकि मुख्यमंत्री को जवाब देना था।
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