मोहाडी के धोप में किसान राजेंद्र सपाटे की मौत, पांच दिन पहले पालकमंत्री को सुनाई थी परेशानी
धोप के 55 साल के किसान राजेंद्र सपाटे ने 3 अक्टूबर को पालकमंत्री डॉ. पंकज भोयर के सामने अपनी आर्थिक तंगी रखी थी। गुरुवार तड़के उनकी मौत की खबर आई।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मोहाडी तहसील के धोप गांव में गुरुवार की सुबह एक किसान की मौत की खबर से मातम छा गया। 55 साल के राजेंद्र अमर सपाटे ने गुरुवार तड़के अपनी जिंदगी खत्म कर ली। सिर्फ पांच दिन पहले उन्होंने अपनी तकलीफ सीधे पालकमंत्री डॉ. पंकज भोयर को बताई थी।
3 अक्टूबर को पालकमंत्री डॉ. भोयर सूखे का जायजा लेने इलाके में आए थे। वे आसपास के किसानों से उनकी दिक्कतें पूछ रहे थे। उसी दौरान सपाटे आगे आए और अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि साढ़े चार एकड़ में लगा धान पानी न मिलने से झुलस गया है। खेती से अब हाथ में पैसा नहीं बचा। जानवरों के चारे का खर्च बढ़ गया है और दूध का उत्पादन भी घट गया है। ऊपर से बेटा और बेटी पढ़ाई के लिए घर से दूर रहते हैं, इसलिए हर महीने उनकी पढ़ाई के लिए पैसे भेजने पड़ते हैं। सपाटे ने सवाल रखा कि ऐसे में परिवार की गाड़ी कैसे खींची जाए। उन्होंने यह भी कहा कि हालात ऐसे ही रहे तो आत्महत्या करने की नौबत आ जाएगी।
सपाटे के बेटे की पढ़ाई अकोला में और बेटी की पढ़ाई नासिक में चल रही थी। घर का खर्च, पशुपालन का खर्च और बच्चों की पढ़ाई का बोझ सब उन्हीं के सिर पर था। उन्हें मदद की आस थी। अपनी परेशानी बताने के बाद उम्मीद थी कि हालात में कुछ तो बदलेगा।
इस साल उन्होंने धान की रोपाई की थी, लेकिन बारिश ने साथ नहीं दिया। खेतों को पानी देने वाले तालाब में भी जरूरत भर का पानी नहीं था। फसल की बढ़त रुक गई और खड़ा धान आंखों के सामने सूखता चला गया। खेती का खर्च फिर भी कम नहीं हुआ। जुताई के साधन, मजदूरी, खाद और बाकी चीजों की बढ़ती कीमतों ने कमर तोड़ दी। खेती के साथ जो पशुपालन का धंधा था, उससे भी उम्मीद के मुताबिक सहारा नहीं मिल रहा था। साल भर की कमाई का जो सहारा थी, वही फसल हाथ से निकल गई। घर चलाने की फिक्र, कर्ज का दबाव और बच्चों की पढ़ाई का खर्च, ये सारी चिंताएं एक साथ बढ़ती गईं।
गुरुवार की सुबह धोप के लोगों के लिए रोज जैसी नहीं थी। गांव में खबर फैली कि सपाटे ने अपने खेत की निजी कुएं में छलांग लगा दी है। कुछ ही देर में पूरे गांव में सन्नाटा और मातम पसर गया। जिस किसान ने कुछ दिन पहले पालकमंत्री के सामने अपना दर्द रखा था, वह अब इस दुनिया में नहीं था। उनकी मौत की खबर फैलते ही गांव में बेचैनी बढ़ गई।
एक मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। राजेंद्र सपाटे की मौत से सिर्फ एक परिवार का सहारा नहीं छिना, बल्कि सूखे के साए में जी रहे किसानों के मसले भी फिर सामने आ गए हैं। पालकमंत्री को अपनी बात बताने के सिर्फ पांच दिन बाद हुई यह घटना गांव वालों के दिल में चुभ गई है। किसानों के मन में यही सवाल सुलग रहा है कि किसान जब बोलता है तो उसकी तकलीफ सुनने से ज्यादा उस पर वक्त रहते कार्रवाई होनी चाहिए, और सरकार ने अब भी कदम नहीं उठाया तो ऐसी घटनाएं कैसे रुकेंगी।