जे.जे. अस्पताल में डॉक्टरों ने खोपड़ी के तले में फंसी गोली सुरक्षित निकाली
जलगांव में फायरिंग की घटना में लगी गोली मस्तिष्क को खून पहुंचाने वाली अहम धमनी के पास फंसी थी। जे.जे. अस्पताल के डॉक्टरों ने चार घंटे में उसे निकाल दिया।
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जलगांव में फायरिंग की एक घटना में लगी गोली को जे.जे. अस्पताल के डॉक्टरों ने ऑपरेशन करके सुरक्षित निकाल दिया। गोली खोपड़ी के तले में, मस्तिष्क को खून पहुंचाने वाली एक अहम धमनी के बिल्कुल पास फंसी हुई थी। एक सेंटीमीटर की इस गोली को निकालना डॉक्टरों के लिए बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने कामयाबी से पूरा किया।
बताया गया है कि जलगांव की घटना में कनपटी पर पिस्तौल तानी गई थी। उसी वक्त संबंधित व्यक्ति ने अचानक हरकत की, इसलिए गोली मस्तिष्क में घुसने के बजाय खोपड़ी के तले में जाकर अटक गई। इससे मस्तिष्क को सीधी चोट पहुंचने का खतरा टल गया।
फिर भी मुश्किल कम नहीं थी। खोपड़ी का तला ऑपरेशन के लिहाज से बेहद नाजुक हिस्सा माना जाता है। गोली अंदरूनी कैरोटिड धमनी के पास अटकी थी, जो मस्तिष्क को खून पहुंचाने वाली मुख्य धमनियों में से एक है। ऐसे में गोली की सही जगह का पता लगाना और आसपास के जरूरी हिस्सों को नुकसान पहुंचाए बिना उसे निकालना डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ा सवाल था। रक्तवाहिनी को चोट पहुंचने का जोखिम भी था।
यह ऑपरेशन मेडिकल कॉलेज और सर जे.जे. समूह अस्पताल के डॉक्टरों ने किया। इसमें न्यूरो नेविगेशन तकनीक, सी-आर्म इमेजिंग और एंडोस्कोपिक तकनीक का इस्तेमाल हुआ। न्यूरोसर्जरी और कान-नाक-गला विभाग के डॉक्टरों ने आपसी तालमेल से यह जटिल ऑपरेशन पूरा किया।
ऑपरेशन न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. वर्नन वेल्हो और कान-नाक-गला विभाग के प्रमुख डॉ. श्रीनिवास चव्हाण की देखरेख में हुआ। न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉ. हृषिकेश, कान-नाक-गला विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. नवीन सिंह, एनेस्थेसिया के डॉ. अनंतन कृष्णन और रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. अरुंधी ने भी अहम भूमिका निभाई। अस्पताल के मुताबिक इस तरह जोखिम भरे हिस्से से गोली निकाल लेना जे.जे. अस्पताल के कई विभागों के मिलकर इलाज करने और डॉक्टरों की काबिलियत को दिखाता है।
जे.जे. अस्पताल के डॉ. श्रीनिवास चव्हाण ने कहा, "गोली आकार में छोटी थी और मस्तिष्क के आसपास के बेहद नाजुक हिस्से में फंसी थी। इसलिए उसकी सही जगह ढूंढना बड़ी चुनौती थी। लेकिन सी-आर्म, न्यूरो नेविगेशन और एंडोस्कोपी तकनीक की मदद से गोली की जगह तय करके उसे सुरक्षित निकाला जा सका। मस्तिष्क के इस नाजुक हिस्से से गोली निकालने में करीब चार घंटे लगे।"
डॉ. चव्हाण ने तारीखें भी बताईं। उनके मुताबिक जलगांव में गोली लगने की घटना 12 अक्टूबर को हुई थी। मरीज को 13 अक्टूबर को जे.जे. अस्पताल लाया गया और 14 अक्टूबर को ऑपरेशन करके गोली निकाल दी गई।